आर्यासप्तशती | Aryasaptasati

5 5/10 Ratings.
1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
शेयर जरूर करें
Aryasaptasati by अनन्त पण्डित - Anant Pandit
लेखक :
पुस्तक का साइज़ : 11.52 MB
कुल पृष्ठ : 235
श्रेणी :
हमें इस पुस्तक की श्रेणी ज्ञात नहीं है | श्रेणी सुझाएँ


यदि इस पुस्तक की जानकारी में कोई त्रुटी है या फिर आपको इस पुस्तक से सम्बंधित कोई भी सुझाव अथवा शिकायत है तो उसे यहाँ दर्ज कर सकते हैं |

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

अनन्त पण्डित - Anant Pandit

अनन्त पण्डित - Anant Pandit के बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है | जानकारी जोड़ें |
पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश (देखने के लिए क्लिक करें | click to expand)
आर्यासिप्तशती १ काव्यानि विहितानि परंतु न तत्र शैलरोदनमिति सावः । श्रावा किमिति रोदिति । एवं चैतत्कृतकारुण्ये जामाठसंबन्वेन शैठस्यापि रोदनमिति भावः । अथवा । भवभूतेः दिविश्वयस्थ संबन्धात । सस्कपात इत्यथे । भारती भूघरभुरेव । भूचर इति कि- नाम । भवसूतिरिति गिरिजाया कुचौ वन्दे भवभूतिसिताननी इति परदकरणीत्तर पदवीनाम । तस्माद्धवत्वे दस्येव जाता । एवं च सरखतीश्रचारसतत एवेान्यकविन्स- तिरेको ध्वन्यते । सम्वेतत्कवेभूघरटे कि अमसरणसत आइ--अस्यथा । एतट्कवेभूंधर- त्वाभावे । एतत्कतकारुण्ये प्रावा पाषाण क्थ रोदिति । एवं चैतत्कृतकारुण्योत्तर कालीनपाघाणरोदनसैतत्सेबन्वाभावेडन्य धानुपपत्या कबों भूवरखसिद्धि । एवं च जन्यजनकमावर्सबन्धादोदने युक्ततैव । एवकार इवाये इति केचित्‌ जाता शिखण्डिनी आग्यथा शिखण्डी तथावगच्छामि | प्रागल्म्यमथिकमाएुं वाणी बाणों बस्ूवेति ॥ ३७ ॥ जातेतिं । श्राकपूर्व यथा शिखण्डिनी डपदपुत्री दिल्षण्डी छुपदपु रूपा जभूव तथा वाणी सरखव्यधिकप्रागल्श्यप्रास्यर्म बाण कार्देम्बरीकठरूपा बम्ूव । पवर्मतृती यान्त- स्थबवकारयोरमेदादिति भाव । एवं च सरखंतीतो 5चिकतवं बाणें योस्यते । बस्तर चवयोरक्ये दोषाद्धेद एवं ॥ ये गणयन्ति गुरोरनु यस्पास्ते घर्मकर्म संकुचितम्‌ । क्बिंगहसुदानससिंव हूं ताते नींलाम्बरें वन्दे ॥ ३८ ॥ यमिति 1 ये शुरोः प्रभाकरात्त । एवं च तन्न प्रभाकरतन्न्ननिपुणत्वं सातस्यायेद्यते । पक्षे बुदस्पते । अनु पश्चाद्रभयन्ति । यस्वास्ते नाक । पके सूथमण्डलसां निध्ये- नादरीने । धर्मकर्म संकुचितम । तातसदशस्यान्यस्त्र धर्सकर्मन्रबतैकस्यामावादिति भाव पछें सलमास इच झुक्तास्तेपि केप्रांचित्कर्मणां निर्वेधादिति सावः । यहा यस्य तातस्तर घर्मकर्मे । एवं चाधर्मकर्मणो 5भावो व्यज्यते । संकुचित सम्यक् की ४- शिव्यं चित व्याप्तमू । आास्ते । एवं वा कर्सठत्नेन सर्नत्र तातंप्रसिद्धिरिति सावः 1 यट्ढा यस्थाधर्मक्मे विषय संक्चितं संकोच 1 भीतिरिति यावित्‌ 1 आस्तें कईिं काव्यक्तीरम । पक्षे तनामानसू । उशनसंपिय झुकमिव । ते प्रसिद्ध ताते नीखाम्ब- रासिधे वन्दे पे . सकलकलाः कल्पयितुं मभुः मनन्वस्य कुसुदबन्वोश्व । सेन कुछतिलकगूपतिरेकों राकाप्रदोषश्व तह ३९. 1 सक्िति । प्रचन्धस्प चतुः्षषिकलाः । कुमुदबन्घोश्वन्द्रस च. पोडशकलाः 1 कर १. सेनकुलं कायरथ्रकुल चद्देशप्रसिद्धम तलिरकायसानों सूपतिलश्मणसेलः थ- त्समारथा गोचर्पनाचार्य आायीत्‌. न वु सेलुवन्वकाव्यकर्ता करमीरमद्दाराज शचरसेनः. सेठ क्षत्रियकुलावतंस भाबीदिति राजतरन्रिष्यों सकुटमेव ः




  • User Reviews

    अभी इस पुस्तक का कोई भी Review उपलब्ध नहीं है | कृपया अपना Review दें |

    अपना Review देने के लिए लॉग इन करें |
    आप फेसबुक, गूगल प्लस अथवा ट्विटर के साथ लॉग इन कर सकते हैं | लॉग इन करने के लिए निम्न में से किसी भी आइकॉन पर क्लिक करें :