श्रीराम चरितमानस | Sriramcharitamanas
श्रेणी : धार्मिक / Religious, हिंदू - Hinduism

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
93.54 MB
कुल पष्ठ :
990
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)१४ / श्रीरामचरितमानस हैं। सर जार्ज ग्रियर्सन ने तारी ग्रीव्स ने हस्तिनापुर गार्सां दि तासी ने हाजीपुर डॉ० रामदत्र भरद्वाज आदि ने एटा के प्रसिद्ध तीर्थस्थल सोरों एवं अन्य कई विद्वानों ने गोंडा के वाराह क्षेत्र को इनकी जन्मस्थली स्वीकार किया है। इन वैमत्यों के बीच अधिकांशतया साक्ष्य राजापुर के पक्ष में जाते हैं और राजापुर को ही इनका जन्म स्थान माना जाता है। जन्म संवत् तथा जन्म स्थली की भाँति उनकी उपजाति भी विवाद का विषय है। तुलसी के अन्तस्साक्ष्य से ज्ञात होता है कि ये जाति के ब्राह्मण थे किन्तु कोई इन्हें सरयुपारीण मानता है कोई कान्यकुब्ज तथा कोई सनादय। उपजाति के अन्तर्गत मिश्र शुक्ल दुबे या गोसाईं से इन्हें सम्बद्ध किया जाता है किन्तु यह स्पष्ट हो चुका है कि गोसाईं इनकी उपजाति थी। अधिकांशतया विद्वान् इन्हें दुबे उपजाति का सरयूपारीण ब्राह्मण मानते हैं । इनके पिता का नाम आत्माराम दुबे बताया गया है। यह एक निविर्वाद सत्य है कि गोस्वामी तुलसीदास की बाल्यावस्था नितान्त संकटापन्न रही है। इस संकटापन्न बाल्यावस्था के मूल में क्या कारण रहा है इस विषय में विद्वानों के बीच पर्याप्त मतभेद है। इस विषय में अनेक जनश्रुतियाँ भी हैं। कोई कहता है कि अभुक््त मूल नक्षत्र में पैदा होने के कारण माता-पिता ने इन्हें त्याग दिया था किन्तु यह जनश्रुति सत्य नहीं प्रतीत होती । तुलसीदास की विभिन्न रचनाओं के अन्तस्साक्ष्यों से ऐसा प्रतीत होता है कि--थोड़े ही समय के पश्चात् इनके माता-पिता का देहावसान हो गया था और उसके पश्चात् ये निराश्रित होकर जीवन व्यतीत करने लगे थे। विनय पत्रिका में एक स्थल पर स्वयं कवि ने ही सूचना दी है-- तनु तज्यो कुटिल कीट ज्यों तज्यो मातु पिताहेँ कुटिला कोट को विशेषता यह है कि वह संतति उत्पन्न करते ही शरीर त्याग देता है--और शायद इसी तरह इनके माता-पिता बाल्यावस्था में ही दिवंगत हो चुके थे। इस सम्बन्ध के साक्ष्य उनकी अन्य कृतियों में भी मिलते हैं। थोड़े बड़े होने पर इनका पालन पोषण सम्भवत किसी हनुमान मन्दिर में हुआ होगा क्योंकि हनुमान बाहुक में कवि ने इस सम्बन्ध में संकेत दिया है- खायो खोंची माँगि तेरो नाम लियो रे अर्थात् कवि हनुमान का नाम जपता हुआ मन्दिर के चढ़ावे से अपना जीवन यापन करता था। तुलसीदास अपनी बाल्यावस्था में भीख माँगकर गुजारा करते थे इस तथ्य के भी संकेत उनकी कृतियों में प्राप्त होते हैं। कवितावली में उन्होंने अपनी बाल्यावस्था की विपननता का बड़ा ही मार्मिक दृश्य प्रस्तुत किया है-- मातु पिता जग जाइ तजे बिधिहूँ न लिखी कछू भाल भलाई। नीच निरादर भाजन कादर कूकुर टूकनि लागि ललाई॥ कवि का मूल नाम क्या था इस सम्बन्ध में विद्वानों ने रामबोला नाम का संकेत किया है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने कवितावली में रामबोला नाम शब्द का उल्लेखे किया है किन्तु उसको प्रामाणिकता का कोई उल्लेख नहीं है। विनय पत्रिका में एक स्थल प्रेर उल्लेख है कि गोस्वामी तुलसीदास बाल्यावस्था में अनामधारी थे-- फिरयो बिललात ढिनु नाम उदर लागि दुख दुखित मोहिं ं हैरे। इनको माता का नाम हुलसी तथा पिता का नाम आत्माराम दुबे जनश्रुतियों # मर बताया जाता है। रामचरितमानस में कवि ने हुलसी शब्द का प्रयोग किया है और उसका अर उनको माता के सन्दर्भ में भी किया जाता है। अकबर के नवरत्न अब्दुर्रहीम खानखाना ने इनकी माता का नाम हुलसी बताया है-- सुरतिय नरतिय नागतिय सब चाहत अस होइ। गोद लिये हुलसी फिरै तुलसी सो सुत होइ॥
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