सुभाषित - शौरभ | Subhashit Shourbh

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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सुभापित - सौरभ [ ११जानीजज जी ७दया धर्म नदी-तीरे, सर्वे धर्मास्तृणाडकुरा । तस्या छोषमुपेताया, कियत्‌ तिष्ठन्ति ते चिरम्‌ू 11श्रथ --दया धर्म नदी के समान है । दूसरे सत्य श्रादि ध्म दया नदी के सुख जाने पर अधिक नहीं ठहर सकते ।सर्वे वेदा न तत्कुयु , सर्वेयज्ञाइच भारत । सर्वे तीर्थाभिषेकाइंच, यत्कुर्यात्‌ प्रारिनाँ दया ।।प्रथ॑ --जीव दया वह कार्य कर दिखाती है, जो वेद, यज्ञ एव तीर्थाभिषेक नहीं कर सकते । हीनसा दीक्षान सा भिक्षा, न तद्दान न तत्तप । न तज्ज्ञान न तदुध्यान, दया यत्र न विद्यते ॥।श्रथे --वास्तव मे वह दीक्षा, दीक्षा नही, वह भिक्षा, भिक्षा नही, वह दान, दान नहीं श्र वह तप, तप नहीं तथा वह ज्ञान, ज्ञान नहीं और वह ब्यान, ध्यान नहीं जिसमे दया न हो 1यत्नादपि परक्लेशं, हतु या हृदि जायते । इच्छा भूमि सुरश्रन ष्ठ, सा दया परिकीतिता 11भ्थे --यत्न से दूसरों के कष्ट को हरने की जो इच्छा हृदय मे उत्पन्न होती है हे सुरश्नष्ठ ! वहीं दया कही गई है ।क्रीडा भू सुकृतस्य दुष्क्ृतरज सहारवात्या भवो-- दन्वन्नौव्यप्रनार्ति मेत्र पटल, सकेत दूती शियाम्‌ू 1




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