श्रीरामांक | Shri Raamank

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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<रहसटूरटर्वरूरूरसडाडर सर्द श्रीरावचन्द्रं सतत नमामि ( श्रीशिवकृत रास-स्तुतति ) शीडिंव उदाच खुन्नीवमित्र॑ परसं. पणिन्र॑ सीताकलन्र. नवमेघगान्रम्‌ । कासण्यपा्॑ दातपफत्रनेत्र॑. श्रीरामचन्द्रं॑ सतत चमामि ॥ संसारसारं.. निगमप्रचारं॑. धर्माचतारं इतभ्रूपियारम्‌ । सदाविकार खुखसिन्घुसारं श्रीरामचन्द्रं सतत चमासि ॥ खदमीविलासं जगतां.. निवास लड्ाविनाशं भुघनमकाशस्‌ । भूदेवचास. शरदिस्दुद्दासं श्रीरामचन्द्र सतत नमामि ॥ मन्दारसालं. चचने.. रसाल॑.. गुणैर्विशाल. इतससतालस्‌ । क्रव्यादकालं. खुरठोकपालं . श्रीरायचन्द्र सतत. तयादि चेदान्तगावं _ सकलें . समान. इतारिसामं. जिद्शप्रधानस्‌ ! गजेन्द्रयाव॑ विगतावसानं थीरामचन्द्रं. सतत चसामि ॥ इयामाधिरामं नयनाभिरामं.. थुणाभिरायं बचनाभिरासस्‌ । चविघ्वप्रणामं _ छंतभक्तकासं शीरामचन्द्रं. सतत बमाहि ॥ लीलादशरीर... रणरज्घीर... विश्वेकसार... रघुवंधहारस । गम्भीरनाद जितसर्ववादं शीरामचन्द्रं सतत. नमासि ॥ खले छृतान्त॑स्जने विनीतं सामोपगीतं सचसा प्रतीतमू रागेण गीतें. चचनादतीतं श्रीरामचन्द्रं सतत नमामि ॥ ( आनन्दरामायण; सारकाण्ड१२ । ११६--१२३ ) शरीद्षिवजी वोले--सुप्रीवके मित्र, परमपावन, सीताके पति, नवीन सेघके समान शरीखाले, करुणाके सिन्चु और कमलके सदरा नेत्रवाले श्रीरामचन्द्रकी मैं निरन्तर वन्दना करता हूँ । अपार संसारमें एकमात्र साखबस्तु, वेदोंका प्रचार करनेवाले, धर्मके साक्षात्‌ अवतार; भूभारका हरण करनेवाले, सदा अधिकृत रहनेवाले और आनन्दतिन्धुके सारभूत श्रीरामचन्द्रको मैं सदा नमस्कार करता हूँ । लरमीके साथ विढास करनेवाले, जगतके निवासस्थान, छड्लाका विनाश करनेवाले, मुबनोंको प्रकाशित करनेवाले, ब्राह्मणोंको शरण देनेवाले और शारदीय चन्द्रमाके समान झुस्र हास्यसे बिभूषित श्रीरामचन्द्रको मैं सतत नमन करता हूँ | मन्दारपुर्थोकी माला घारण करनेवाले, रसीठे वचन बोलनेवाले, गुणोंमें महान्‌, सात ताछ ब्रक्षोंका ( एक साथ ) मेदन करनेवाडे, रा्षसोंके का तथा देवलोकके पालक श्रीरामचन्द्रको मैं नमस्कार करता हूँ । वेदान्त ( उपनिषदों ) द्वारा गेय, सबके साथ समान बर्ताव करनेवाले, शत्रुके मानका मर्दन करनेवाले, गजेन्द्रकी सवारी करनेवाले तथा अन्तरहित देव-शिरोमणि, श्रीरामचन्द्रकों मैं सतत नमस्कार करता हूँ । र्यामसुन्दर, नयर्नोंको आनन्द देनेवाले, गुणोंसे मनोहर, हृदयप्राही वचन बोलनेवाले, विश्ववन्दनीय और भक्तजनोंकी कामनाओंको पूरी रे करनेवाले श्रीरामचन्दरको मैं निरन्तर प्रणाम करता हूँ । छीलामात्रके लिये शरीर घारण करनेवाले, रणस्थलीें स+ घीर, विश्वमरमें एकमात्र सारभूत, रघुवंशमें श्रेष्ठ, गम्भीर वाणी बोलनेवाले और समस्त वार्दोको जीतनेवाले श्रीराम- चन्दरको मैं प्रतिक्षण प्रणाम करता हूँ । दु्जनोंके छिये गृत्युरूप; अपने भक्तोंकि प्रति नम्रभाववाले, सामवेदके द्वारा तो स्तुत, मनके भी अगोचर, प्रेमसे गान करनेयोग्य तथा वचनोंसे अग्राह्म श्रीरामचन्द्रको मैं सर्वदा नमस्कार करता हूँ । 21 वि दूध ््द््ा 3 '<स्रड यू ८ <<दटार्ारवदादरदा-रद-टद् सअदरूदारादाददा-रूदरटद न




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