मैत्रायणी संहिता | Maitrayani Samhita

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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श्प,१०.उक्थयग्रह, घवग्द्द, ऋतुग्रह, ऐन्द्रानग्रह, बेएवदेव,ग्रह,माध्यंदिन सवन (१५४३)०णुक्-मन्थी, आग्रायण और उक्थूयग्रहों का पुन- ग्रहण, मरुत्वतीयग्रह, सवनीय पुरोडाश-यजन, मरुत्वती यग्रह-होग, माहेन्द्रेग्र ह,तुतीय-सवन (१४४)-णआदित्यप्रह, आप्रायण-उवबधूय का पुनर्प्रहण, सवनीय-यजन, साधचिभिग्रह, चैएवदेवग्रह, सीौम्य चरु, पात्नीवतग्रह, हारियोजन, ग्रह, अति- ग्राहयग्रह, पोडशीग्रह, दघिग्रह, आदाभ्य, और अंशुग्रह, पश्वे-कादशिनी, द क्षिणा-होम, समिष्ट यजुहोम, अवभूथ, काम्य पणुयाग, उदवसा- नीयेप्टि,(४) अ्निप्टोम के अवान्तर भेद (१४६) उव्थूय, अतिराघ्र और पोडणी, सोमयार्गों के अन्य भेद,वाजपेययाग १५१०काल, देखता-हुवि, यजन-घिधि, प्रात: सवनमाध्यं-दिन-सवन, रथधारोहुण, रथ दौड़, सपारोहण, अन्नहोम, अभिषेक, ग्रहहोम, पशुयाग, तुतीय-सवन,राजसुययाग १४५५-काल, देवता-हवि,() यजन-विधि, (१६१)-- नेक्रत-आनुमत इप्टि, पाँच विशिष्ट हुवि- यगि; . आप्रायणोध्टि, . चातुर्मास्ययाग, इन्द्रतुरीयाग, भपामार्गहोम, पंचेध्यीय होम, देविकाहवियागि, त्रिपंयुक्त हविर्यागि, रद्नियों की हवियां, विशिष्ट हृवियगि,(व) दीक्षणीयेण्टि (१६५)-- मेत्रावाईस्पत्य चरु, देवसुव हृथियां,




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