ऋक्संहिता ४ | Rigveda Samhita 4

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Rigveda Samhita 4 by राजाराम शास्त्री - Rajaram Shastriशिवराम शास्त्री - Shivram Shastri
लेखक : ,
पुस्तक का साइज़ : 38 MB
कुल पृष्ठ : 602
श्रेणी :
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राजाराम शास्त्री - Rajaram Shastri

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शिवराम शास्त्री - Shivram Shastri

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म०७ अ सू ११ |] चतुथोकः १३ अन्तरिक्षे श्रितोव्याप्त घूमप्केतुः प्रज्ञाकाअभवत अश्यनुमापकर्वातधूमस्य्‌ ॥ मा- प्रा उदाचयणोहढ़पवादितिविकक्तेसटाचत्वमू । मन्दः मदिस्तुतिमोद्मद्स्वप्रका न्तिगतिषु अ्रस्तृत्यथाद्स्मात स्फायिनंचीत्यादिनारक्‌ अन्तादान । कवि कमेरिनसर्वघातुक्यइती - नपत्यय बाहुलकान्मकारस्यवत्वरफलापश्च व्यत्ययनान्तोदात्तत्वमू । उदनिष्ठ उत्पर्वादुर्ध्व- कमवाचिर्नास्तपरतरात्मनपदा व । दिवस्वतः विप्रव दसतःसंपदादिलक्षणाभाविक्रिप तद्- स्यारतीनिमनतुष माइपघायाश्वतिवतं मतृपानुदात्तत्वाद्धातस्व॒र ॥ 3 ॥ अधथचतुर्थी- अभ्रिनॉयज्ञमुप॑वेतुसाघया३िनरो वि भरन्तेय्हेएहे । अध्रिदतोअंसवद्धव्यवाहनों प्रिरंणानाइंणतेकर्विकतुम्‌ ॥ ४ ॥ अगिः । नः । यज्ञम । उप । वेतु । साघुध्या । अगिम । नर । वि । झरन्ते । गहेडणह । अग्ि । दूत । अभवव | हृव्यधवाहनः । अधिम । टणाना । दणते । कविध्कतम ॥ ४ ॥ साधुया सर्वपुरुषार्थानांसाधकः अभ्िनेपिज्ञअस्मदीयंयार्गप्रति उपबनु आगच्छतु नरः मनप्या गृहग्ह अनुगहं अर्थिविभरनत विहर्रगन्ति विहरणंकुर्वतीत्यथ हव्यवाहनः ह्यानांह वि्पावाट। अधि दतः दवानांदनःअभवत बृणाना संक्जमाना सस्तः कविक्रतु ऋ्रान्तयन्ं अिवृणत संभजन ॥ सापुया सुपांसदगित्यादिनिविभ्कयादिश ॥ £ ॥ अधपचमी- तम्येदर्मप्रमघमत्तमंव् चस्त भ्यमनी पाइ यमस्तशंल्द । त्वसमिर/सिन्घसिवावनी स ही रा््रणन्तिशवसावधर्यान्तिच ॥ ७. ॥। त्यी टदम । अग् । मर्धमतध्तसम । बच । तुस्यम । सनीपा | टयम । अर । शम । हे । त्वाम । गिर । सिन्घमइव । ध्वनी | मही । आ / परणन्त । शवसा । वधयन्ति। च॥ ४ ॥




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