हिंदी आलोचना के आधार - स्तम्भ | Hindi Alochana Ke Adhar Stambh

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Hindi Alochana Ke Adhar Stambh by रामचन्द्र शुक्ल - Ramchandar Shuklaहजारीप्रसाद द्विवेदी - Hajariprasad Dvivedi
लेखक : ,
पुस्तक का साइज़ : 12.24 MB
कुल पृष्ठ : 244
श्रेणी :
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रामचन्द्र शुक्ल - Ramchandar Shukla

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हजारीप्रसाद द्विवेदी - Hajariprasad Dvivedi

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आतोचना का स्वरूप । १७ गुणविशेप की ओर दुक्पात किये बिना की ही नहीं जा सकती । फ्रांसीसी समीक्षक टेन ने थी काव्यालोचन के लिए कवि की जातिगत मनोवृत्तियों सामाजिक-राजनैतिक परिस्थितियों और काल-दशा को दृष्टिपथ में रखने पर बल दिया है। दूसरे शब्दों में यहीं विपय का प्रामाणिक वोघ है । आयु की भिन्तता भी आलोचकों की प्रतिक्रियाओं को भिन्न कर देती है। युवा- वस्था में जो कृति परम प्रिय प्रतीत होती हैं यह आवश्यक नहीं है कि वृद्धावस्था में भी वह वैसी ही प्रतीत हो । इसके अतिरिवत स्तर की भिन्‍नता अथवा विचारघारा में अन्तर होने पर भी आलोचकों की प्रतिक्रियाएं भिन्न हो सकती हैं । अभावों के बीच में पलनेवाले आलोचक मध्यवित्त आलोचक और सम्पन्त आलोचक की प्रतिक्रिया का समान होना भावशयक नहीं है । माक्संवादी समीक्षा-पद्धति के सन्दर्भ में यह स्थिति प्रायः उभरती रहती है । अतः समस्या यह है कि कृति की प्रियता-अप्नियता की कसौटी या है? इस विपय में केवल इतना ही कहा जा सकता है कि भधघिकाधिक सहूदय-समाज की कृतिविशेष के प्रति जो प्रतिक्रिया है वही प्रामाणिक है । यदि पु्वाग्रिहों से मुक्त संवेदनशील व्यक्तियों में से अधिकांश किसी कृति को श्रेष्ठ घोषित करते हैं तो वह कृति निस्सन्देह श्रेष्ठ होगी | इसलिए आलोचक की प्रतिक्रिया भी उसी के अनुकूल होनी चाहिए । (आ) व्याख्या-विश्लेषण कृति. से प्रभावित होने के उपरान्त उसकी प्रियता-अप्रियता के कारणों का विष्लेपण आलोचना का द्वितीय अवस्थान है। इसके लिए आलोचक को काव्यशास्त्र सौन्दर्यशास्त्र मनोविज्ञान तथा समाजशास्त्र का थाश्रय लेना चाहिए । आलोचना करते समय आलोचक के सम्मुख चार तथ्य होते हैं--(अ) काव्य का वाह्याकार (आ) उसमें निहित भाव (इ) कवि की मनःस्थिति जिसने आलोच्य काव्य को जन्म दिया (ई) लेखक की समकालीन परिस्थित्तियाँ जिन्होंने कवि की मनःस्थिति का निर्माण किया | आलोचंक का कर्तव्य है कि वह आलोचना में इच सभी अंगों को उचित स्थान दे । काव्य- शास्त्र के आधार पर कृति के रूप (फार्म ) का विवेचन सौन्दयंशास्त्र के आधार पर उसके भावगत सौन्दर्य का उद्घाटन मनोविज्ञान के द्वारा लेखक की मनःस्थिति का विश्लेषण समाजशास्त्र के आधार पर युर्गीन परिस्थितियों का वर्णन और कवि पर उनके प्रभाव का विद्लेपण आलोचक का चरम लक्ष्य है । वस्तुत साहित्य का भूल तत्त्व तो भाव है किन्तु मावविज्षेप की प्रियता-अंप्रियता लेखक और उसकी परिस्थितियों पर निर्भर करती है । यदि लेखक की परिस्थिंतियाँ विषम हैं तो उसके काव्य पर उनका प्रभाव अवद्य पड़ेगा । किन्तु यदि आलोचक इस और ध्यान नहीं देता तो वह ख्रष्टा के प्रति न्याय नहीं कर सकेगा । उदाहरणतया रीतिकालीन दरबारी वातावरण के कारण ही उस युग के काव्य में श्यूंगार-भावना की प्रबलता थी यह स्पष्ट करना आवश्यक है । इसके अतिरिवत कवियों १ क्वासि -भूभिका पृष्ठ १९ २. देखिए सिद्धान्त और अध्ययन पृष्ठ ३० १




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