नक्षत्रोकी छायामें | Nakshatro Ki Chhaya Me

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Nakshatro Ki Chhaya Me by अज्ञात - Unknown

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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श्र; इस स्वेस्व-समपंणके बाद वह वावाके चरणॉपर नतमस्तक हो गया ! ः “पाला मंचिही” ( श्वहुत श्रच्छा' ) कहकर वावाने उसे दोनों हार्थोंसे ऊपर उठा लिया ! हम लोगोंकी श्रोर मुड़कर बावा वोले : “देखा तुमने, इसने श्रपनी सारी सम्पत्ति ही नहीं; सारा जीवन श्रौर सारा परिवार सर्वोदयको दे डाला !?? भूमिदान वह एक दिन पहले ही कर चुका था ! र्भ न न भूदान-यात्रामें--ऐसे एक-दो नही; श्रसंख्य पावन नक्षत्र हम रोज श्रपनी भ्राँखों देखते हैं । सानवकी उदारता; मानवकी दयालुता; मानवकी पवित्रता प्रकट करनेवाले ये प्रसंग किसे द्रवित नहीं करते ? किसे प्रसप्न नहीं करते ? किसे ऊपर नही उठाते ? न न न गुरीवोंके लिए; दीन-दुःखियाँके लिए; शोपितां-पीड़ितोंके लिए श्राशाका एकमात्र प्रकाशस्तम्म है--भूदान । नक्षत्रोंकी छायामें भूदान-यज्ञके ध्वयुं संत विनोवा भावेके झतुगमन में उड़ीसा; हैदरावाद श्रीर ्रा्रमें मैंने २॥ मास विताये हैं । दो बारमें-- पहले सितम्बर ४५४. में, फिर फरवरी-माचे ५६ में । उन्हीं दिनोंके सस्मरणॉकी हैं ये ठेढ़ो-मेढी, श्राड़ी-सीघी रेखाएं ! सन्‌ का पहला दिन 1 21 ब्२ नर,




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