दोहावली | Dohawali

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Dohawali by अज्ञात - Unknown

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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दोहावली वृष ककााताकतवाव कवर्स कवा पता वतवातवकाहतवततााशावतवातवानातमातवातातततवेलवानकक दम्क:वं, मुखरूपी दरवाजेकी देहलीपर रामनामरूपी [हवाके झोके अथवा तेलकी कमीसे कभी न बुझनेवाला नित्य प्रकाशमय ] मणिदीप रख दो (अर्थात्‌ जीभके द्वारा अखण्डरूपसे श्रीराम-नामका जप करता रह) ॥ ६॥। हियें नियुंव नयनन्हि सगुन रसना राम सुनाम । मनहें पुरट संपुठ लसत तुलसी ललित ललाम ॥७॥ भावार्थ--हृदयमें निर्गुण ब्नह्मका ध्यान, नेत्नोके सामने प्रथम तीन दोहोमे कथित सगुण स्वरूपकी सुन्दर झाँकी और जीभसे सुन्दर राम-नामका जप करना । तुलसीदासजी कहते हैं कि यह ऐसा है मानो सोनेकी सुन्दर डिबियामें मनोहर रत्न सुशोभित हो । श्रीगुसाइंजीके मतसे *राम' नाम निर्गुण ब्रह्म और सगुण भगवान्‌ दोनोसे बड़ा है--'मोरें मत बड़ नाम दुह तें' । नामकी इसी महिमाको लक्ष्यमे रखकर यहाँ नामको रत्न कहा गया है तथा निर्गृण ब्रह्म और सयुण भगवानुको उस असुल रत्नको सुरक्षित रखनेके लिये सोनेका सम्पुट (डिबियाके नीचे-ऊपरके भाग) बताया गया है॥ ७॥। सगुन ध्यान रुचि सरस नह निर्युन सन ते हरि । तुलसी सुमिरहू रासको नाम सजीवन सुरि ॥८॥ भावार्थ-सगुणरूपके ध्यानमे तो प्रीतियुक्त रुचि नही है भर निर्गुणस्वरूप मनसे दूर है (यानी समझमें नहीं आता) ॥ तुलसीदासजी कहते है कि ऐसी दशामे रामनाम-स्मरणरूपी संजीवनी दूटीका सदा सेवन करो ॥ ८ ॥। एकु छत्ु एकु सुकुटमनि सब बरननि पर जोउ। तुलसी रघुबर नाम के -बरन बिराजत दोउ ॥९॥ भावाथें--तुलसीदासजी कहते हैं-देखो, श्रीरघुनाथजीके नाम विवि 2. न बन कि वि दे वि व दे नल ववतवल




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