पाथेर पांचाली | Pather Panchali

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Pather Panchali by अज्ञात - Unknown

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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ज रू जे व गन्ना नननण छुड व वोली « “मीठी खीलें, तुम्हारे लिए दो पैसे की मीठी खीलें और दो कदमें लाई हु । मुन्ने के लिए एक लकड़ी का गुट्डा लाई हू । बुढ़िया अव अच्छी तरह उठ बैठी । चीज़ों को हिला-इलाकर देखने के बाद वोली . 'देखो, देखो, मेरी रानी बिटिया मेरे लिए क्या- क्या लाई है । तुम रानी बनो, गरीव फूफी पर इतनी दया । देखू ज़रा मुन्ते का काठ का युट्टा देखू ! वाह, बहुत ही सुन्दर है, कितने पसे लिए ?” इसी तरह कुछ देर तक बातचीत के बाद मुन्नी वोली : “फूफी, तु क्या हो गया है ? तेरा वदन तो जल रहा है ?' -उदिन-भर मारे-मारे फिरने से ऐसा हो गया है, इसलिए मैंने कहा कि ज़रा पड़ रह । बच्ची होने पर भी दुर्गा फूफी के घूप में घूमने का कारण समझ गई । उसने दुख और भुख से दुबली फूफी के शरीर पर स्नेह से हाथ फेरा, फिर वोली : “तु जरूर घर भा जा फूफी, सन्ध्या समय कहानी नहीं सुनने को मिलती है, कल ज़रूर आना, क्यो आएगी न * दुढिया की वाछें खिल गई, वोली “क्या वहू ने तुमसे कुछ कहा है ?” राजी बोली : “फूफीजी, चाचीजी ने तो कुछ भी नहीं कहा । चाचीजी नहीं चाहती कि हम लोग यहा गाए । हम लोग कुछ कहे तो, वे नाराज़ होती हैं, पर तुम लौटकर माओो, तो चाची जी कह- कहाकर ठडी पड जाएगी । मुन्नी बोली 'फूफी, कल तू जरूर भाना । मा कुछ नहीं कहेंगी, तो मैं अब घर जाती हू । अच्छा ? किसीसे न कहना, पर कल सवेरे आ जाना । पवेरे उठकर वुढिया ने महसूस किया कि तवियत हलकी है । वि ज़रा दिन घढते ही वह छोटी पोटली मे दो फटे कपडे और मंला झगोछा वाधकर घर की तरफ चली । रास्ते में घोषी वैष्णव की वीवी मिली तो बोली : “वहनजी, घर जा रही हो ? लगता है इतने दिनों ' में भाभीजी का क्रोघ कम हो गया है ।* वुढिया की वाछें खिल गई, वोली : “कल सन्ध्या समय दुर्गा ; रु




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