नीति - शतक | Neeti Shatak

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बाबू हरिदास वैध - Babu Haridas Vaidhya

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भर्तृहरि - Bhartṛhari

महाराज भर्तृहरि लगभग 0 विक्रमी संवत के काल के हैं
ये महाराज विक्रमादित्य के बड़े भाई थे और पत्नी के विश्वासघात
के कारण इनमे वैराग्य उत्पन्न हुआ

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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दे. महाराज के एक छोटे भाई भी थे । उनका नाम राजकुमार विक्रम थी । विक्रम भी बड़े भाई की तरह ही विद्वान , स्यायपरा- यण, धर्मात्मा श्रौर राजनी तिकुशल थ्रे। यह गाजकूमार विक्रम ही हमारे सुप्रसिद्ध प्रताप शाल्ली मद्दाराजाधिरांज वीर विक्रमादित्य थ,जिन्होने भयंकर युद्ध से विदेशी आआक्रमणुकारियों को पराम्त कर. भारत की रक्षा की और उन्हें इस देश से निकाल बाहर कर, अपने नाम से संवत चलाया, जो आजतक विक्रम-संचत वे; नाम से पुकारा ज्ञाता हैं । आपही का चलाया संत्रतू अब तक पंचाड्डों, जन्त्रिगों श्र साहूकीरों के बह्दी ब्वातों मे लिखाजाता हैं। यद्पि काल की कुटिलर गति,जमाने के फेर या देश के दुर्भाग्य से श्रावकल इस्वी सन की तूती बोल रही हैं । लोग चिट्री पत्रियों एवं झन्यान्य कागज और दस्तावेजों में,झापकें संवत को छोड़ ऊर इस्वी सन को लिखने की मूर्खता करते हैं; पर बहुत से सड्ज्नत अपनी भूल को सुधार कर,फिर महाराज के संघन से ही काम लेने लगे हैं । आशा है, सभी भूल हुए दाह पर आज़ाबंगे श्रौर संचत के कारण से महाराज का शुभ नाम यावत्‌ चन्द्र-दिवाकए इस लोक में अमर रहेगा । मददाराज विक्रम के समय में बौद्ध-घम बड़े जोरों पर था | ज्राह्मणु-धम की लीव खोखली होगई थी । आपने दी बौद्धों को सार भगाया और ब्राह्मणु-घर्म की फिर से स्थापना की । श्राप अपने जमाने में भारत के सबंश्रेष्ठ चूपति समझे जाते थे । प्राय: सभी राजे-महाराजे श्वापको अपना सम्राट या नेता सानते थे । सभी




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