वेद मर्य्यादा | Ved Maryyada

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ved maryada  by अज्ञात - Unknown

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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[ ६ इसी प्रकार अ्ग्निपर्व श्योर ऐ्ट्रपर्व थी ईश्वरको ही प्रतिपादन करते हैं तो फिर क्या झारण्यकाध्याय ईश्वरका प्रतिपादक नहीं ? घोर जी धारण्यक नामसे उनको श्रारण्यक के पाठ की श्रान्ति है गई है यदद भी उनकी वेदालभिश्तताका प्रमाण हे। क्या १. वेदमें भ्रारणयक झोर उपनिपद-थे ही नहीं यदि न होते ते आते कहां से । मालूम दाता हैं उन्होंने इस प्रकार समझा हे कि जैसे कोई कहे कि यजु्वेदमें मुख्य उनतालीस शध्याय ही है चालीसवां पीछे से किसीने ईशा चास्य उपनिपद मिलाकर वना दिया। ऐसे भले पुसपको प्रथम यह तो निश्चय कर लेना चाहिये कि इशा वास्यसे मचा चेदमें गए ध्थवा वेद्से इंशावास्य उपनिपट में झाए मालूम होता है कि ऐसा स्फुर विचार न करनेसे यह श्रान्ति हुई कि घ्यारणयकाध्याय चेदमे मिला दिया गया! झ्त्य वात यह है कि ऐसे ाक्ेप्ताओंकों पदले यह भी सोच लेगा चाहिये कि यह पुस्तकोंकि क्रनालोजी ए00०701058) श्रथात्‌ इतिहासका प्र हैं। जब तक कोई सामवेदका पुस्तक एसा न मिले जिसमें श्ाररयकाध्याय की मिलावट न हो तो फिर निप्फल साइस क्यों करना । इतना ही नहीं हमारे पास तो यह पुष्ट प्रमाण है कि जितने लोग श्राजतक सामचेद करठ करते चले श्राप हू उन सबके मत में घ्ारणयकाध्याय सामवेदके पूर्वाचक का छूवां। शष्या हैं घोर इसी प्रकार उनके करदम्प चला श्राता हे । सच्च है जिनके सत में सामवेदम न कार प्ुप्याय मे स्वर न देवता केचल रुराड मुख्ड सामवेद है उनके मत म एफ धारणयवाओं उडादेनिकी कौनसी बड़ी वात थी । म्रपा्टफी की रचना भी उनके मतमें दाललीलाके समान द: 'मथाद, किसी प्रपादकर्मे ६ मनन किसी दर




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