मनोरंजक शास्त्रार्थ | Manoranjak Shastrarth

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Manoranjak Shastrarth by अज्ञात - Unknown

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( ४ +) ज्ाह्मत व्यक्ति को उत्पस्स सहीं फर सकते । छापने ल्राह्मयग्रन्थ का प्रसाख थक कह कर दिया हे कि “प्राह्मण मन्त्र की व्यारूया सें सह!मक होते हें' रशिस्तु को गोपय ज्ाह्मण कर वचन भापने पढ़ा है, उसका प्रकत मन्त्र की ष्यालूपा से कोई सी संबन्ध लीं है । हां प्रकूत मन्त्र का वयारूयामन रूप अहझण में झापफो सुनाता हू-'प्रशापतिरकामयत, -प्रजा्येय इति ।' समुखतखियवूतं निरमिमीत, तमशिद्वतान्व सुज्यत, गायत्री रुन्दो, रधन्तर खान, झाहायो ममुध्यायाम, अज पशुनाम्‌, तर्मा ते मुख्याः मुखतो ऋसच्यन्त” इत्यादि । यहां स्पष्ट प्रकषापतति के मुख भादि से ज्राह्मणादि चारों वणाँ को चत्पत्ति बताई गई दै। अन्यत्र भो शतपथ कायड १९४ अष्याय ४ त्राहाण र में ग्रह था इद्सय जालीत, एकसेव, लदेकं सब ठपमभलवत्‌, सच्क योरु प्रमत्यसलत कत्रभू' इत्यादि गप्रम्थ द्वारा मथम जाहाय को दर क्रमशः .सन्िय, संश्य अर शूद को उत्पत्ति बता कर, घमे ढरा इसको बिभुता छोधित कर, भागे 'लद्द्चितेव देववु श्रह्मामभवत्‌, प्राह्मणों सनुष्येपु, क्षत्रियेग शत्रियों बेश्येन बेश्यः, शुट्रेल शुद्र” इत्यादि ग्रन्थ में तत्वों से तशद्वण को उत्पत्ति भताईं गई है । इससे ब्राह्मण को व्यारूया सबंधा मेरे पक्ष सें अनुकूण है । पका जाहाद जाक्य भी हमारे विसुट मदीं पड़ता, क्योंकि रस सें पातेग ज़ाह्यवः: संशितो भयति” लिखा है, ,कमें से जाह्मण,मशंसनीय झोता दे-घह चब हो सानते हैं । गुण, करे से ब्राह्मण अनना इस वाक्य में, कहां है? आप ककते हैं, व्याकरण शादि यदि इमें वदू विरुहू ले आय, तो थे दि, साने आय ? किन्तु में निवेदुत करता हूं कि चिसा व्याकरण भादि के जाप चेदूनिसद्ड या वेद जुकल केसे समक सकेंगे ! .लिसा व्याकरण _ भादि को चह्ायता के तो किसी शब्द का झर्थ हो नहीं. मतोत हो सकता विरोध जार भगुकलता केसे नालुम, होगी .। झापने. जो मम्त्र परमंप्था, दिये हैं, दे बचनयि शापशा अभिनत सिद्ध भों कर सकते ,। “मशमेवेद्स इत्यादि सल्त्रों का विशेष अये सनातनधमे की टूष्टि से तो कुछ [शेर की (साघबादि पुरातसभाष्यानुसार.सास्खस ऋषि को वाक नाम को बाम्या जह्यरमाव के आदेश से यह सब कहती है किसे हो जो चाह यो करातो हूं ।-में हो अझा बनातो हूं जादि । अतएव महू , सिन्रावरुणो भा




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