धर्म-प्रश्नोत्तरी | Dharm Prashanottari

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dharm prashanottari  by अज्ञात - Unknown

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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धर्म-प्रनोतरी । ष्टर ०--ऋषि श्रौर पितर किसको कहते हैं? उ० -घ्रह्माएडके सभी काय्य॑ तीन भागोंमें विभक्त हैं। पक , . क्ञॉनका विस्तार करना, दूसरा कर्मको चलाना तथा कर्मका फल देना श्रौर तीसरा घह्मारडके -स्थूल शरीर- की ब्यवस्था ठीक रखना । ऋषिलोम कानका विस्तार क्ररते हैं, देवतागण कर्मको . चलाते, हैं क्‍और पिदगण घ्रह्माएडके स्थूल शरीरकी व्यवस्था करते हैं।. श्रीप्म- चर्षा, छाडि.ऋतुअका ठीक .ठीक होना, ठीक. समयपर पानी चरसना,' खेतीका . होना, : देशमें. दुर्मिक्ष. न होना, घोमारी न होकर देशका खास्थ्य टीक रखना--इत्यादि कर्मका भार पितरोपर है। ऋषि, देवता, पितर सभी- , देवता हैं । हमारे पूरे मरकर-जो पितूलो करे गये हैं, पितर इससे श्रलग हैं। वे नैमित्तिक पितर-फहलाते हैं । प्र०--श्रवतार किसे कहते हैं ः उ०--जव संसारमें कोई झरठुर या राक्षस ,पेदा होकर धर्मका , नाश, श्रधर्मकी चुद्धि तथा साधुझ्ोंको कष्ट दिया करता है, तव श्रीभगवान साकाररूपसे संसारम प्रकट होकर , खस झसुर था राक्षसका नाश, करके 'घर्मरक्षा तथा साधुझोंको रक्षा करते हैं । श्रीभगवानकां गसा ध्रकट होना झवतार कहलाता है। सत्य, चेता, द्वाप्रर श्रादि युगोंमें ऐसे श्रनेक वार प्रकट, हुए हैं. और, श्रागे भी ' होंगे । उतमेंसे २४ शवतार मुख्य हैं श्र उन २४ मंसे ्‌




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