मनोरंजन पुस्तकमाला-२४ | Manoranjan Pustakmala-24

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Manoranjan Pustakmala-24 by अज्ञात - Unknown

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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(55 ) इपी छे सुधार पद यापारणवा मानियाठ संग डा ्ं होगा, भाग बढ मैया है दैदा दो यंग भागे मी हिग, मद पड मूवन्य मपिष्यन्यय पर सपना प्रसाद ढाउता! पढ़ यू, भर फेयठ यहीं वर, मनुष्य पृ्धामों का फड ही जा सफता हैं। घापारण पकुवि के मनुष्यों में यह मरमाद ही पिदोष पढछशाछी होगा, छितु सिनमें छुए भी मह्ठिप्क-अवरों है मे बूतन पिपारोताइन एप सुबगन्पामि में भारयदत्त रो द्वारा वंचित नहीं रफ्स जा सकते । मनुष्य का यददी शुभ रे उत्तरपायित्य पढ़ा कर उसे अपनी वृद्धा फा फत्ता पनाठा ६, मनुष्य को दो प्रकार फा संग प्राप्त है, अर्थात्‌ मनुर् भौर पुस्वकों फा ।. सत्संग भप्टवम शुरु दे।. इससे अर शिक्षा मजुष्य फो फह्दीं से भी नहीं माप्त दो सकती। ईस छिये उचे उचित है कि भच्छे से अच्छे मनुष्यों भौर पुर फा संग प्राप्त फरे । जो जैसे छोगों भर मंथों का संग रख! है चद वैसा दी दो जाता है, वरन्‌ यों फद कि मलुष्य जैसा दोता दै वैसा दी संग दूँदता है । उसका स्वभाव सदा उस फे संग से जाना जा सफवा दै। प्रकृति से दी मनुष्य भ्ु' करणशीक दे । इस छिये अच्छे संग में रददने से चदद संगियों के सदूराण मराप्त फरता हुआ दिनों दिन उन्नति करता जाता है। किंतु कुखंग में पढ़ने से उसमें क्रमशः दुशुणों की इछि दोती दे! यदद एक भाफ़तिक नियम है कि. मनुष्य जिस को बढ़त देखता है उसे व साधारण समझने लगता दे « प्रकार नेद्दी कम्मेंसमुदाय उसके साधारण कार्यों में #.. होनाविहें । “यदि कोई कसंगवि में पड़ा, ..यो




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