टानिया | Taniya

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Taniya by मक्सिम गोर्की - maxim gorkiश्री छबिनाथ पाण्डेय - Shri Chhabinath Pandey

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श्री छबिनाथ पाण्डेय - Shri Chhabinath Pandey

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( हे ३ “माइयो, नमस्कार । ईश्वर आपके कायें में सहायक दो !” खुले दरवाजे से द्ोकर यफं की तरदद उंडो चायु आ रददी थी. जिसके स्पर्श से उसके पेरों में भाफ के जलविंदु छुराने लगे । वहू.' देइली पर खड़ा-खड़ा हमें नव से शिख तक निद्दार रहा था। उसकी 'चमकीली 'थऔर मुद्दी हुई मूँदों के वीच में उउज्वल दॉत 'चमक रहे थे । उसकी घासकट सचमुच मामूली घासकर्टों फे मेल की नददीं थी । उसमें तीले-नीले वूटे बने थे, माणिक के छोटे-छोटे 'और पवमचसाते हुए चटनीं से उसकी शोभा छुदद 'और दी दो पद थी । घड़ी की चेन घासकट के ऊपर लटक रद्दी थी । यद सिपाद्दी बड़ा मनोहर व्यक्ति था, लंचा था, सस्थ था। उसके गाल शुलावी रंग के थे, बड़ी-वड़ी और सुडौल ाँखों में सौददादं मलक रद्द था, दप्टि बढ़ी दी 'माहमादकारिणी थी । उसके सिर पर एक सफेद 'और देदीप्यमान टोपी थी । 'चोगा बहुत साफ-छुथरा था, उसमें किसी प्रकार का घब्वा नहीं था । उसके नीचे से जुकीलें सिरे के बढ़िया और .काले-काले चूट मॉक रहे थे । दर भंडारी ने-उससे नम्नतापूवक द्वार बंद: कर देने को कहा । सिपाद्दी ने विना किसी इतावली के किवाइ प्रिपका दिए, और । लाकर इस लोगों से . मालिक के घारे में प्रश्न करने लगा । इस | लोगों ने एक साथ ही बोलना छारंम किया 'और घसे समकायाः, । कि सालिक पका घूत॑, दुराचारी और व्यत्यंत . क्रूर दै। बढ शुलामों से पशुन्तुल्य काम लेता है । कहने का मतलव यदइ कि




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