सक्षिप्त सूरसागर | Sanchipt Sursagar
श्रेणी : जीवनी / Biography

[adinserter block="2"]
लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
28.55 MB
कुल पष्ठ :
486
श्रेणी :
यदि इस पुस्तक की जानकारी में कोई त्रुटि है या फिर आपको इस पुस्तक से सम्बंधित कोई भी सुझाव अथवा शिकायत है तो उसे यहाँ दर्ज कर सकते हैं
लेखक के बारे में अधिक जानकारी :
पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)१४ अेम मरेम सब कोइ कहै प्रेम न चीन्दे कोय । आठ पहर भीना रहे प्रेम कहावे साय ॥ जा घट प्रेम न संचरे सो घट जानु मसान । जेसे खाठ लाहार की सांस बेत बिन प्रान ॥। अरेस तो ऐसा कीजिए जैसे चन्द चकोर । घीच टूटि भ्रुई मां गिरै चितवे वाही झोर ॥ अधिक सनेही माछुरी दूजा अल्प सनेह । जबहीं जऊ ते बीछुरै तबही थागे देह ॥ जहाँ प्रेम तह नेम नहि. तहाँ न बुधि व्योहार । प्रेम मगन जब सन भया तब कौन शिने तिथि बार ॥। प्रेस भाव इक चाहिये मेष झनेक बनाय । भावे यह में बास कर भावे बन में जाय ॥ जोगी जंगम सेवड़ा संन्यासी दुरवेस । बिना प्रेम पहुंचे नहीं दुरठभ सतगुरु देस ॥। जब छगि मरने से डरे तब ठगि प्रेमी नाहि । बड़ी दूर है प्रेम घर समुसि लेहु मन माहि ॥ अ्रेम भक्ति का गेह हे ऊँचा बहुत इकत । सीस काटि पग तर घरै तब पहुंचे घर संत ॥। परमेश्वर से विरह जोच को व्याकुल कर देता है। साखी । बिरहिन दे संदेसरा सुना हमारे पीव । जल बिन मच्छी क्यो जिये पानी में का जीव ॥। बिरद्द तेज तन में तपे अंग सबे झकुछाय । घट सूना जिव पीव मे मौत ट्ूंढ़ि फिर जाय ॥ बिरह जलती दुखि कर साई झआामे घाय । अम बूंद से छिरकि के जठती लई बुमाय ॥
User Reviews
No Reviews | Add Yours...