वेदकाल निर्मय | Vedkaal Nirnay
श्रेणी : ज्योतिष / Astrology

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
4.94 MB
कुल पष्ठ :
166
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
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सायका |
कक कं की
मासानां मागशी पोध्हस् ॥मगवदूगीता भ० १० इलोक ३५ ॥मार्गशीष का महीना, जिस प्रकार कि घतंसान काल मेंबैत्र का महीना वर्पारम्भ का है वेदिक काल में बप के
श्रारम्भ का मद्दीना था श्र उसका नाम श्ाम्रदायण था । इस
बात के प्रमाणों का संग्रह कर लोकमान्य तिलक ने इस पुस्तक
में-सिद्ध किया है कि उस समय का वद्द स्थान कि जद्दाँराज सूये २१ साच को दीखता है ओर प्रथ्वी के बहुत भाग में
रात 'और दिन वरावर चारद्द घणटों के होते हैं सगशीष नक्तत्रपर था । वर्ष में झाजकल राददिन दो बार बरापर होते हे । एक२१ सोच को और दूसरे २९ सितम्बर को । २१ माच के उसस्थान को कि जहाँ सु उस दिन दीखता है वतंमान काल कावसन्त सम्पात और २२ सितस्वर को जहाँ सूये दीखता है उसस्थान को शग्त्सम्पात कहां जाता है, क्योंकि चसन्त ऋतु काप्रारम्भ २१ साचें से और शरद ऋठु का प्रारम्भ र९ सितस्थरसे होता है । किन्तु ये दोनों सम्पात स्थिर नहीं, अर्थोत्के जो तारे झाज इन दोनों सम्पात स्थानों में हें सददा वे ही तारेसम्पात स्थानों पर नहीं रदते । सम्पातों में गति कोने के कारणकभी कोई तारा सम्पात पर रददता दै और कभी कोई । यद्द गठिं
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