स्वामी रामतीर्थजी के लेख व उपदेश जिल्द 2 | Swami Ramteerthji Ke Lekh Va Upadesh jild 2

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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थक ' जिहद दूसरी संक्षिप्तजीवनी श् . नियमाचुसार तीथंराम ने गुजराँवाला दवाई स्कूल में, स्पेशल क्लास में, भरती दोकर दो वर्ष में मिडिल श्रौर दो वर्ष में इन्ट्रन्ल की भी परीक्षा दे दी । इन्ट्न्स की परीक्षा के समय उनकी : ायु १४॥ वर्ष की थो, श्रौर परीक्षा में उनका नंवर पंजाव ' में दप्वां रहा । ' झापके पिता का साम जवाहिरलाल था 1 थ्ापकी मादा शिशुपन में ही मर गई थीं । इससे शाप झपनी दादी के हाथों पले । भगतजी बचपन ' ही से करामाती थे । झापकी शिक्षा साधारण देसी थी । झापको लड़कपन में कुश्ती का बड़ा शोक़ था । शोर झागे चलकर श्राप इस . विद्या में बड़े निषुण हो गये । एक वार आपने एक झपने से दूने पहलवान को कुश्ती में दे सारा । मकतब की शिक्षा के वाद आप ठठेरी का धंधा करने . लगे । और उसमें शीघ्र निपुण दो गये। अपनी १४ चर्ष की शायु में झाप एक बार कटासराज तीथे के मेले पर गए । वहां झापने श्नेक साघुझओों के दर्शन किये । कटासराज झापको बहुत ही भाया। श्यापने वहाँ एक बर्तनों की दूकान कर ली । वहाँ झाप जो पेदा करते, सब साधुर-सतों को खिला देते । झापने वहीं कुछ॒हृठ-योग की साधना की श्र उसमें ्ाप दृद़ साधक बने । आपको कथा-वार्ता और सत्संग का वड़ा शौक था । प्रौर जब कभी भक्ति शोर प्रेम का प्रसज्न झाता, तो आपके लोचनों में जल भर जाता । इसी कटासराज में आप कुछ शेर व स.ख़ुन भी कहने लगे । श्रापकी शेर ( कवितायें ) वड़ी चुरीली होती थीं । एक वार ब्यापने योगवासिष्ठ की कथा दड़े ध्यान से सुनी, तव से झाप में धद्टेल त्रह्म- ज्ञान का भाव भर गया । छाप सबको ईश्वर या घह्म कहने लगे । * अब भी भगत जी के परिचित लोग उन्हें इंश्वर ( रव व खुदा ) ही कहते हैं । जब छापमें इस घ्रह्म-भाव की जिज्ञासा वढ़ी, तो झाप फिर गुजरॉँवाला ले छाये । यहाँ ापको कई मद्दात्साद्ों के दुशन हुये, जिनसे थ्ापने




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