जैन हितोपदेश - भाग 2, 3 | Jain Hitabodh Bhag 2,3
श्रेणी : धार्मिक / Religious

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
6 MB
कुल पष्ठ :
400
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)शी ज़ेनहितोपदेश:माग- जो. 39
«:/ सुभापषित'रतावली सुख अवेश
सफर हो सदा ता कमान रपरथ पवन गध दर रथ
सेगर संमरद्रधी तारणहार श्री +जिनेश्वर देवने नमस्कार करी स्त-
परना. हितने माटे हुं सुभापितुं रनावठीनों व्यास्या कूरूंछं ?
! हुं-घमे-आचरण कर, ज्ञानीए निंदेठों .यहदापापनी
.... त्याग कर, छुखदाबी समकीतनु संवन, कर; महा दुख
बाय: मिथ्याएवुनो ;स्याग, कर, उत्तम जञाननों अम्यास कर, _बतनु
सेवन कर अने पांचे इंद्रिंयोलु दमन कर, छीना संगत पण ' स्याग
:-कर, तेमज .सदोप्त काम सेवानो सवंदा स्याग कर, र. .
खी संदंधी मुंदर देदलु -भतुरु नप देखीने भोगद ! हूं मनमां
निर्दोप विचार कर, श्री तीैकर देवनां चरण कमटनी सेवा कर, सदू-
रुनी सट्टा, भक्ति, कर वजन मकारना शुद्ध तपुँ सेवन कर. अने
_ जीभने,सश कर, .तेमन हे भाइ! राग द्रेप. सहित सब कपायनों हूं
(कालीधी) त्याग कर, ?
है भद्र:!.तुं सर्वे -नीवोमां दया भाव रास्य, सत्य वाणी दद
'परघन अने अन्रह्म सेवानों स्वेथा त्याग कर, तेपन दुगेततिदायक
प्ररिह मूच्छाने त्यज. ४. ए-,
सबदा श्रेष्ठ वेराग्यने भज; सुक्तिदायक निय्र॑य सुनिनो संग कर;
अने दुनेनोनो संग, त्यजी दे, दे मिंतरे ! हूं वीतराग 'देवनी भार्वथी
भक्ति कर. के“ - :-
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