श्रावकाचार संग्रह - भाग 5 | Shravakachar - Sangrah Vol. - V

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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प्रस्तावना ७सिथ्यात्वपूर्ण एवं मन-गढन्त लोक-प्रचलित मिथ्यात्रतो का वर्णन कर उनके त्याग का जैसा उपदेग किशनसिंह जीने दिया है वैसा दोष दोने नही किया है।पदन कविने मिथ्यात्वके निरूपणके परचात्‌ सम्यक्त्व-प्राप्तिकी योग्य भूमिका वर्णन कर सप्त तत्त्वोका भौर सम्यक्त्वके भेदोका स्वरूप विस्तारसे कहा है । किन्तु किगनरसिंह जीने ेंपन क्रियाभो को गिनाकर और सिथ्यात्व एव सम्यक्त्वका कुछ थी वर्णन न करके सूलगुणोका वर्णन करते हुए इस प्रकारके अमक्ष्योका विस्तारसे वर्णन किया है। दौलतराम जीने भी सगलाच रणके परंचात्‌ मिथ्यात्व-सम्यवत्वका वर्णन न करके अमक्ष्य-पदार्थोका वर्णन किया है । साथ ही दोचोने भक्षय-अभक्ष्य वस्तुमोको काल-मर्यादा का वर्णन प्राचीन गाथाओ के प्रमाण के साथ किया है ।पदमकवथविने रत्नकरण्डकके समान सर्वप्रथम सम्यक्त्व के अगोका विस्तृत स्वरूप और उनसे प्रसिद्ध पुरुषों की प्रदनोत्तर शावकाचार के समान कथाओ का निरूपण किया है । किन्तु किशन सिंह जी ने सम्यक्त्व के अगो का भौर उनमें प्रसिद्ध पुरुषो को कथाओं का कुछ भी उल्लेख नही किया है । दौलततराम जो ने अति संक्ष प मे भाठो अगो का स्वरूप कह कर उनमे प्रसिद्ध पुरुषों के केवल नामोका ही उल्लेख किया है ।पदम कवि ने उक्त प्रकार से सम्यग्दर्शन का सागोपाँग विस्तृत वर्णन करके परचात्‌ दर्शन प्रतिमा का वर्णौन करते हुए सर्व प्रथम सप्त व्यसन-सेवियो मे प्रसिद्ध पुरुषो का उल्लेख कर उनके त्याग का उपदेश दिया । ततत्पदचात्‌ अष्टमूल्गुण, पालने जल-गालने भौर रात्रिभोजन के दोष बत्ताकर उसके त्यागका उपदेश दिया । सदनन्तर ब्रत प्रतिमाके अन्तगंतत श्रावकके बारह ब्रतोका विस्तार से वर्णन किया है । किन्तु किशनसिंहजीने प्रतिभागो के आधार पर उक्त वर्णन न करके आठ मूल गुणों का वर्णन कर अत्यक्ष्य पदार्थों का विस्तार से वर्णन कर उनके त्याग का और चौके के भोत्तर ही भोजन करने का विधान किया है ।पदम कविने सम्यक्त्वके अगोका गौर उनमे प्रसिद्ध पुरुषोको कथाओका वर्णन कर न्रत प्रतिमा भादिका विस्तारसे वर्णन कर अन्तमे छह आवइयक, बारह तप, रत्तवय धर्म और मेत्री-प्रमादादि भावनाओका वर्णन कर अन्तसे समाधिमरणका वर्णन कर अपनी वृहत्‌ प्रदस्ति दी है । किन्तु किदशनर्सिहुजीने अभक्ष्य व्णनके पदचात्‌ रजस्वला स्त्रीके कर्तव्योका विस्तारसे वर्णन कर श्रावकके बारह ब्रतोका गौर समाधि मरणका वर्णन किया है । त्तद- स्तर श्रावककी ग्यारह प्रतिमामोका सक्ष पसे वर्णन कर जल-गालन, रात्रि भोजन-त्यागरूप अणथधम (अनस्तमित्त) ब्रत गौर रत्नवय घर्मका वर्णन कर कैर-सांगरी आदिकी घृणित उत्पत्ति, गोद, मफीस, हल्दी और कत्या भादिकी जिन्दय एव हिसामयी उत्पत्तिका विस्तारसे वर्णन किया है । तत्परचात्‌ मिथ्यामतोका निरूपण करते हुए लूँ कामतकी आाचार-ह्ीनता का, और जिम-प्रतिमा का विस्तारसे वर्णन किया है ।पदम कवि ने लूँकामत्त का कोई उल्लेख नहीं किया है और दौलतराम जोने नामोल्लेख न करके उनके मतकी समालोचना कर जिन प्रतिमाकी सहत्ताका गंका-समाधान पूर्वक्त वर्णन किया है । इससे ज्ञात होता है कि पदम कविके समयसे लू कामत्तका या तो प्रारम्भ ही नहीं हुआ था, गौर यदि हो भी गया होगा, तो उसका प्रचार उनके समयसे नगण्य-सा था ।




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