उत्तराखंड के पथ पर | Uttaraakhand Ke Path Par

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
30 MB
कुल पष्ठ :
181
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)श्२ उत्तराखंड के पथ परगया था :
“खंडा: पंच हिमालयस्य कथिता नेपाल-कर्माचलो ।
केदारोडथ जलंधरोधथ रुचिर: कदमीर-संज्ञोधन्तिम: ॥।'”
वे पांच खंड हे--१. नेपाल २. कर्माचल ३. केदार
४. जलंधर तथा ५. काइमीर । काली नदी के पूर्व में नेपाल-खंड
है, पद्चिम में कर्माचल या कुमाऊं । यह खण्ड आजकल अलमोड़ा
और नेनीताल के दो जिलों में बंटा हुआ है । कर्माचल की पर्चिमी
सीमा से यमुना तक कदार-खंड है, अर्थात् गंगा और यमुना का
सारा पनढर इसमें सम्मिलित हे । मध्यकाल में छोटे-छोटे सामंतों
की ५२ गढ़ियों (राज्यों) में विभक्त होने के कारण इसे गढ़,
गढ़वाल अथवा बावनी कहा जाने लगा | पुर्वकाल में देहरादून भी
गढ़वाल का अंग था; लेकिन अंग्रेजों ने उसे मेरठ कमिरुनरी में डाल
दिया । आजादी के बाद जब भारत का पुनगंठन हुआ तो टेहरी
राज्य को उत्तर प्रदेश में मिलाकर उसका एक स्वतंत्र जिला
बनाया गया |
पुराने समय में जलंधर पद्चिमी हिमालय का एक बड़ा
खण्ड था, जिसमें सतलज, व्यास, रावी और चुनाब, ये नदियां
बहती थीं । आज उसकी सीमा बदल गई हे । वह शिमला-कांगड़ा
अर्थात् हिमाचल प्रदेश तक सीमित हैं ।
काइ्मीर पंजाब के उत्तर में हे और अपने सौंदयं के लिए सारी
दुनिया में प्रसिद्ध है ।
हिमालय की भूमि अनेक दृष्टियों से अत्यन्त मनोरम है ।
उसके दिखर, उसकी उपत्यकाएं, उसकी नदियां, उसके वन, उसके
प्रपात, उसके निवासी, सब अपनी विद्षेषता रखते हें। ती्थों
की तो हिमालय में भरमार है । उसके पांचों खण्डों में से एक भी
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