साहित्यिक जीवन के अनुभव और संस्मरण | Sahityik Jivan Ke Anubhav Aur Sansmaran

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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[७] समय में अम्बाला-डिवीजन के करनाल जिले में--पुडरी के सनातनघमं हाई स्कूल मे--सस्कृत हिन्दी का अध्यापक था । इस स्कूल के प्रघानाध्यापक प० वनीघर शर्मा एम० ए०, वी ० टी० मेरे मित्र बन गए थे , क्योकि आप भी सस्कृत के एम० ए० थे--लाहौर के सनातनधरमं कालेज से आए थे। दार्मा जी नें ही मुझे लाला आात्माराम जी से मिलाया था । लाला आत्माराम जी पुस्तक देख कर वहुत प्रसन्न हुए ; पर सलाह दी कि इस में ईसा, विक्टोरिया तथा वर्तमान सम्राट के जीवन श्रौर दे देने चाहिए । में ने ईसा का जीवन देना तो मान लिया , पर अन्य कुछ देने को राजी न हुआ। तव लाला जी ने स्पष्ट कहा कि ऐसी स्थिति में आप की पुस्तक मेट्रिक में न लग सकेगी ।. बहुत समझाया कि छात्रों में अच्छे विचार जाएँ गे और आप को काफी रुपये मिलें गें , हुजें क्या हैं वैसा करने में ; पर उन की सुन्दर सीख नें मेरे ऊपर कोई असर न किया ! तब उन्हों ने कह दिया कि ऐसी स्थिति में पुस्तक इधर-उधर भेजने में डाक-खर्चे और वढाना व्यथे हे। लाला जी की यह वात सुन कर में ने हू पुस्तक भी फाड दी ! माधुरी का प्रकाशन इसी समय वडे ही ठाट-वाट से 'माघुरी' नाम की मासिक पत्रिका लखनऊ से प्रकाशित हुई। “नवल किशोर इस्टेट' के मालिक मुन्शी विष्णुनारायण भार्गव की पुप्कल धघन-




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