लघुसिद्धांतकौमुदी | Laghusiddhantakaumudi

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
31 MB
कुल पष्ठ :
965
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)(८पाणिनीय व्याकरण के अध्ययन के अथम युग का अन्त पतझलि के “महामाष्य”
सें ही होता है । पाणिनि के स्थान-को सुददढ़ चनाने में वस्तुतः कास्यायन और पतझि
का योग-दान अद्वितीय है ! इसी से व्याकरण-सादित्य में इन तीनों को 'मुनिश्नय' के
नाम से पुकारा जाता है ।जयादित्य-वामनपत्नलि के परवर्ती काल सें “अष्राप्यायी” उ्औौर “सदाभाष्य” पर उपरिसित चाड्यय
का निर्माण हुआ 1 साथ ही साथ पाणिनि के आधार पर कई एक दूसरी व्य:करण-
पद्धतियों की भी रचना हुई, किन्दु उन में किसो विशेष सौलिकता के देन नहीं
होते । पाणिनीय-परम्परा सें अगला सहत्त्वपूर्ण नाम जयादित्य ल््औौर वामन का आता
है । भी अनन्तशास््री फड़के ने 'काशिका” को भूमिका सें जयादित्य का समय ६६१
ई० गौर वामन का समय ६७० ई० मान! है ।* इन दोनों ने मिलकर “व्पष्टाध्यायी'
पर “काशिका” नामक पक सर्वाज्ञीण ठोका की रचना की है। श्री युधिष्टिर मीमांसक
के अतुसार “का शिका” के प्रथम पांच अध्याय जयादित्य द्वारा और सोप तीन अध्याय
वा सन द्वारा लिखे गये हैं॥' “कादिका' में अनेक विछ॒स प्राचीन भ्न्थकारों और दूत्तियों
के मत्तों को उद्दूत्त किया राया है, लिनका उल्लेग्व अस्यत्र प्रात नहीं दोता ! इसके
सभी उदाइरण गौर प्रत्युदाइरण प्रायः प्राचीन इत्तियों के अनुसार हैं । यथास्थान
सणपाठ का भी सन्निवेदा हुआ है । इस प्रकार पाणिनीय व्याकरण में इसका स्थान
काफी महददर्थपूर्ण है । परवर्तों काल में इस पर मनेक टीकाओं वही रचना हुई, जिनमें
प्यास या 'काशिका-विचरणपश्चिका' ( निनेन्द्रवुद्धि ) सौर 'पद-सझरी' ( हरदनस
मिश्र ) विद्ोष उल्लेखनीय हैं ।भरत॑दरि
तु्दरिं
इसी समय के उास-पास भवूंदरि का नाम आता है। संभव है कि यही भर्तृंद्रि
न वि 2: न 5. जयशतक-नय ( शठज्ञारथतक, नोतिरातक और वेराग्यशतक ) के भी रचबिता रहे हों 1]:
चोनी यात्री इत्तिंग के आधार पर इनकी स्त्यु ६५० ईं० में मानी जाती दे 1$* काशिका ( चीखम्बा, १९८७ बिं० )--पृ०् ५ |मे 'संस्कत-व्याफरणदास्तर का इतिदासी-एमयम भाग ( प्र० सं० फै, पू० देद३ |
_ ये घी सुचिष्टि मौमांसक ने इनका काल बि० सं» १५१०-१५७५ माना है ।
देग्िय--सिल्दत ब्याकरणशास्र का इतिदासर--घ. माग (प्र० सं ते पूल ३५१]ई थी सुधिछिय मीमांसफ नें इस मत का खरदन किया है। उन्दोंने भर्वद्रिड्धि ड थी ज#,फा का चिर संग ४५० से पूच माना है । चदी, पूरे रे, ५८-४४ |
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