भारती - पद्ध - धारा | Bhartiya Padh Dhara
श्रेणी : साहित्य / Literature

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
2 MB
कुल पष्ठ :
178
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)श्शू
कहां खजूर वडाई तरी, कल कोई नहीं पावे ।
ग्रीखम रित झब ग्राइ तुलानो, छाया कास न झावे ॥
अपना चतुर झीरको सिखवे, का्मिनि-कनक सयानी 1
कहूँ कबरी सुनो हो सन्तो, राम-चरण रति मानी ॥
(ष्णे
मैं कारें बूमों झपने पिया की वात री ।
जान सुजान प्रात-प्रिय पिय दिन, सबे दटाऊ जात री 1
झासा नदी अगाघ कुमति वहै, रोकि काहू पे न जात री ।
काम-क्रोध दोउ भये करारे, पड़े वियय-रस मात री ।
ये पाँचो झपभानके संगी, सुमिरनकों शलसात री ।
कहै कवीर विछुरि नहिं मिलिही, उयों तरवर विन पात री
(शव
भीजे चुनरिया प्रे म-रस दंदन ।
झारत साजके चली है. सुहागिन पिय म्पने को हूंटन ।*
काहेकी तोरी वनी है चुनरिया काहेके लगे चाणे फूदन ।
पाँच तत्तकी वनी है चुनरिया नामके लगे फृदन।
चढिये महल खुल गई रे किवरिया दास कवीर लागे भूलन 0
(१६)
पिया मेरा जागे में केसे सोई री ।
पाँच सप्ली मेरे सपकी सहेली,
उन रेंग रुंगी पिया रग न मिली री ॥।
सास सयानी ननद देदरानो,
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