श्रावकाचार - संग्रह भाग - 4 | Shravakachar - Sangrah Bhag - 4

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Shravakachar - Sangrah Bhag - 4  by प. हीरालाल शास्त्री - Pt. Heeralal Shastri

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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सम्पादकीय-वक्तब्य भारतीय ज्ञानपीठ काशीसे सच १९५२ मे प्रकाशित वसुनन्वि श्रावकाचारकी प्रस्तावनामें मैंने श्रावकधर्मके प्रतिपादन-प्रकार, क्रमिक विकास और प्रतिमाओका आधार आदि विषयोपर पर्याप्त प्रकाश डाला था । उसके परचात्‌ सन्‌ १९६४ मे भारतीय ज्ञानपीठसे ही प्रकाशित उपासका- ध्ययनकी प्रस्तावनामे उसके सम्पादक श्वीमान्‌ पं० कैलादचन्द्रजी सिद्धान्तशास्त्रीने श्रावकधमंपर और भी अधिक विद्वद प्रकाश डाला है । अब इस प्रस्तुत श्रावकाचार-संग्रहके चार भागोमे संस्कूत- प्राकृतके ३३ श्रावकाचार और पाँचवें भागमे हिन्दी-छन्दोबद्ध तीन श्रावकाचार एवं क्रियाकोष संकलित किये गये है । उन सबके आधारपर प्रस्तावनामे किन-किन विषयोंको रखा जायया, इसकी एक रूप-रेखा इस संग्रहके तीसरे भागके सम्पादकीय वक्‍्तव्यमे दी गई थी । उसके साथ श्रावक- आचार एवं उसके अन्य कर्तव्योपर भी प्रकाश डालनेकी आवक्यकता अनुभव की गई । अत. इस भागके साथ दी गई प्रस्तावनामे मूलगुणोंकी विविधता, “अतीचार-रहस्य, पब्चामृताभिषेक, यज्ञोपवीत, आचमन, सकलीकरण, हवन, आइह्ल्वानन, स्थापन, विसर्जन आदि अन्य अनेक विषयो- की चर्चा की गई है, जिसके स्वाध्यायशील पाठक जान सकेंगे कि इन सब विधि-विधानोंका ससा- वेश श्रावकाचारोंमे कबसे हुआ है । देव-दर्शनार्थ जिन-मन्दिर किस प्रकार जाना चाहिए, उसका क्या फल है ? मन्दिरमे प्रवेश करते समय 'निःसही' बोलनेका क्या रहस्य है, इसपर भी विदद प्रकाश प्रस्तावनामे डाला गया है, क्योकि 'निःसही' बोलनेकी परिपाठी प्राचीन है, हालॉकि श्रावकाचारोंमे सर्वप्रथम पं ० आशाधरने ही इसका उल्लेख किया है । पर इस 'निःसही'का कया अं या प्रयोजन है, यह बात बोलने वालोके लिए आज तक अज्ञात ही रही है । आशा है कि इसके रहस्योद्धाटनाथं लिखे गये विस्तृत विवेंचनको भी प्रबुद्ध पाठक एवं स्वाध्याय करनेवाले उसे पढकर वास्तविक अर्थको हृदयज्भम करेंगे । श्रावकके आचारमे उत्तरोत्तर नवीन कत्तंव्योंको समावेदा करके श्रावकाचार-निर्माताओने यह ध्पान हीं नही रखा कि दिन-प्रतिदिन हीनताको प्राप्त हो रहे इस युगमे मन्द बुद्धि और हीन दाक्तिके धारक गृहस्थ इस दुवंह् श्रावकाचारके भारको वहन भी कर सकेंगे, या नही ? परवर्ती अनेक श्रावकाचार-रचयिताओने सुनियोके लिए आवश्यक माने जानेवाले कर्त॑व्यो- का भी श्रावकोके लिए ब्रिधान किया । इसी प्रकार सुनियोंके लिए सूलाचारमे श्रतिपादित सामायिक- वन्दनादिके ३२-३२ दोषोके निवारणका भी श्रावको के लिए विधान कर दिया । कुछने तो प्राथ- मिक श्रावकके लिए इतनी पाबन्दियाँ लगा दी है कि साधारण गृहस्थको उनका पालन करना ही असभव-सा हो गया है । इन सब बातोपर विचार करनेके बाद प्रस्तावनाके अन्तमे आजके युगानु- रूप एक रूप-रेखा प्रस्तुत की गई है, जिसे पालन करते हुए कोई भी व्यक्ति अपनेको जैन या श्रावक मानकर उसका भलीभॉतिसे निर्वाह कर सकता है 1




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