विश्वभारती पत्रिका भाग - 8 | Vishva Bharti Patrika Bhag - 8

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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सामध्जस्य डे ठसको दुष्प्राप्य कहकर किसी सो व्यक्ति को वंचित नहीं करना चाहता--पंथ कितना ही लंबा, कितना ही दुगंम क्यों न हो इस परमलास के लिए वह कुछ भी नहीं है । इसी कारण धरती पर भाजतक जिन किन्दीं मददात्मा ने भानन्द द्वारा उनको प्राप्त किया है वे विज्लजन के लिए भमृतभण्डार का द्वार खोल देने के लिए खड़े हुए हैं--और जो केवलमात्र ज्ञान या केबलमात्रईँआचार में ही निविष्ट हैं वे मेद्विभेद के द्वारा पग-पग पर मनुष्य के परस्पर मिलन के उदार क्षेत्र को बिल्कुल पुफण्टकाकी्ण कर देते हैं। वे सब केवल भ-्कां भोर से ही देखते हैं, हॉकी ओर से नहीं । इसी कारण उनका भरोसा नहीं है, मनुष्य के प्रति उनकी श्रद्धा नहीं है और ब्रह्म को मी वे निरतिशय शझूल्यता के बीच निर्वासित करके रख देते हैं । महर्षि देवेदनाथ के चित्त में जब धर्म की व्याकुलता प्रबचू हुई तो वे अनन्त नेति नेति को लेकर परिनूप्त नहीं हो सके, यह आइचरय का विषय नहीं है, किन्तु उस व्याकुलता के वेग में समाज और परिवार के चिर सस्कारगत अभ्यस्त मार्ग में अपने व्यथित हृदय को समर्पित करके अपने रुदन को रोक कर रखने की किसी प्रकार की चेष्टा नहीं की, यही विस्मय का दिषय है। वे किसे चाहते हैं यद अच्छी तरह जानने के पहले ही उन्होंने उन्हीं को चाहा था, जिनका ज्ञान चिरकाल से जानना चाहता रहा है और प्रेम जिनको चिरकाछ से पाता भा रहा है । इसीलिए जीवन के भीतर उन्दोंने उस ब्रह्म को ग्रहण किया, परिमित पदा्थ के समान जिनको पाया नहीं जा सकता गौर गृन्य पदार्थ की मॉति जिनको नहीं प्राप्त नहीं किया जा सकना--जिनको पाने के लिए एक भोर ज्ञान को खबें नहीं करना पढ़ता; दूसरी भोर प्रेम को उपवास कराकर मारना नहीं होता--जो वस्तुषिशेष के द्वारा निर्दिष्ट नहीं हैं अथवा वस्तु- झुन्यता के द्वारा भनिदिष्ट नहीं हैं; जिनके विषय में उपनिषद्‌ ने कहा है कि जो कहता है कि मैं' उनको जानता हूँ वह भी उनको नहीं जानता, जो कहता है कि मैं नहीं जानता बह भा उनको नहीं जानता ।. एक शब्द में उनकी साधना परिपूर्ण सामंजस्य की साधना थी । लिस्होंने मदषि की जोवनी पढ़ी है उन सबने देखा होगा कि मगवत्पिपासा जब उनमें पहले छाग्रत हुई तब उनके हृदय को किस प्रकार की दु सह वेदना से तरगित कर दिया था। फिर भी वे जब ब्रह्मानद का रसाखाद करने लगे तब उनको उद्दाम भावोन्माद में भात्मविस्मृत नहीं कर दिया। क्योंकि उन्होंने जिनको जीवन में प्रतिष्ठित किया था वे शाम्तें शिव भद्दीत-- भपने मीतर समस्त शक्ति, समस्त जान, समस्त प्रेम, अतलत्पर्शी परिपूणता से युक्त हैं । उनके भीतर बिश्वचराचर शक्ति और सौंदयरुप में नित्यनिरंतर तरगित दो रहा है--वह तरंग समुद्र को छोड़कर चछी नहदीं जाती भौर समुद्र उस तरग के द्वारा स्वयं को उद्देछित नहीं




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