अद्वैतादर्श | Adwaitadash
श्रेणी : साहित्य / Literature

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Add Infomation AboutBhanushankar Ranchorji Shukla
लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
64 MB
कुल पष्ठ :
524
श्रेणी :
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No Information available about भानुशंकर रणछोड़जी शुक्ल - Bhanushankar Ranchorji Shukla
पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)ति-जीव-पुनजेन्म-बंध-मोक्षादिकी भी चर्चा की गई है६5 पूवाक्त ग्रंथ, मत-पंपांके कारणबरादमें हैं. अर्थात
सूछ तत्वोंके, स्वरुप ओर उनके परिणाम-फल-के संबंधी हें
कायवादका चचापर नहीं है. १-१३ दे२स १९३९ तक. यद्यापे कितनेक आगूही, स्वार्थी, हीं
विश्वासी, लाकंष्याग्रसद्, लोभी, अज्ञ, अविद्वान, अतारन्ु, वा अभि
मानी भाई ग्रथाकों वांचक कदाचित् निंदा पर उतरके निंदक ठे
रावग; तथापे निंदा स्तुतिका मूल मुख्यत१ मान्य,-सः्ाई,- नीयत ,-
परअज्ञातता,-संबंध,-फन,-ओर लाभ हानीके उपर निभर हे;
अत में उनकोभी त्वच्छ टृष्टिसि नहीं देखना चाहतीचारकों चोर कहना, सपें अग्नि वगरेके दोष जनाना, दे
ष्य-मेत्र-पुत्रादेको के सामने दुष्टांके दोष दरसताक उनको उनसे
बचाना, बुर काय॑ करते हुयेको पकडना, : पदार्थोके गण दोष क
थन करना, राजा वगरेके दोष गुणवाले इतिहास लिखूना-इत्यादि
यधाथ निंदा स्तुति करने वाले दोषपात्र-निंदक-वा वोह कथन
'नदा नहीं है. यथा राम, कृष्ण, व्यास, शंकर, बद्धै. महावीर,
बाइबल-कुरान-पुराणकत्ता, दवता वगेरोने नामभी लेंलेके परदोष
कथन कस. है, उनमें जा यथाथ हे सो निंदा नहीं मानीजाती,किंतु साहुकारको चोर कहना, वा सर्प समान निष्प्रयोजनफकेंसी दूसरे निरपराधीकीमी हानी करना वा चोरकोभी ' साहकार
कहना पाप-निंदा-त्याज्य कम है द
जो उक्त व्यवहार न मानाजाय, तो सच्ची निंदा स्तुतिके
_ दिना जीवोनति राज्य व्यवहार, प्रह्मत्तनिद्त्ति मात्रका उच्छेद
होके हानी ओर जीवन व्यवहारकी अव्यवस्था होजाती हें; अतः
दंभी कर्पीटिया समान मझको इस प्रसंग कोइ पिथ्या दोष आरों
, पक्का भय नहीं हे.
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