शांतिप्रिय द्विवेदी जीवन और साहित्य | Shantipriy Dvivedi Jivan Aur Sahitya

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Shantipriy Dvivedi Jivan Aur Sahitya by मालती रस्तोगी - Malati Rastogi

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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विषय-प्रवेश ११४ कुण्ड मे रहते थे । यह काल उन्हे अनेक कष्टो मे व्यतीत करना पडा था । इस सम्बन्ध मे जो विवरण उपलब्ध होता है वह उनकी मनोदशा और व्यथा का परि- चायक है। मृत्यु के पूव॑ं भयानक रोग से अनवरत सघ्ष करते हुए जब वह टूट-से गये तब उन्हें अपनी मृत्यु का पूर्वाभास हो गया । उन्होंने अन्तिम साँस लेने से पं अपने दाह सस्कार के विषय मे यह इच्छा व्यक्त की थी कि “मेरो अन्त्यष्टि वहाँ न की जाए जहाँ राजा महाराजाओ या महान नागरिकों की होती है वरन्‌ मेरे शव को हरिश्चन्द्र घाट के उस स्थान पर जलाया जाए जहाँ सामान्य नागरिक जलाए जाते है ।”* यह शब्द द्विवेदी जी की निराश मन स्थिति के परिचायक है । उदर रोग के अत्यन्त नाकु दौर से गुजरते हुए और मर्मान्तक व्यया को सहन करते हुए २७ अगस्त, सन्‌ १९६७ को द्विवेदी जी का काशी मे स्वगंवास हो गया । स्वभाव और प्रकृति श्री शातिप्रिय द्विवेदी को अन्य ब्राह्मणों के सद्श्य ही मधुरता प्रिय थी क्योकि ब्राह्मणों के लिए प्रमुखत यह विख्यात है कि 'ब्राह्मणमू मधुर प्रिया ' । श्री द्विवेदी जी की यहीं स्वाभाविक प्रवृत्ति इन्हे प्राकृतिक वातावरण की ओर भग्रसर करती थी । प्रकृति के ससगं से प्रकुतिफल कनेर जो अपनी मधुरता के लिए प्रसिद्ध है, से मित्नता-सी हो गयी थी । श्री द्विवेदी का स्वभाव बचपन मे इतना भोला- भाला एव निष्कलक था कि बचपन मे एक बार कुछ गोद खा लेने पर इनको यह भय हुआ कि कही नीम का वृक्ष इनके सिर पर ही न उग आए । जीवन के प्रारम्भिक क्षणो से ही प्रकृति के प्रति अनुराग था, प्रकृति की चतुरगिनी कलाएँ इन्हे स्वदा अपनी ओर आकर्षित करती रहती थी । अपने स्वभाव की सरलता-तरलता मे वे मानव जगत भर प्रकृति जगत मे भिन्‍नता लक्ष्य नहीं कर पाते थे । बाल्यावस्था मे बालकों का जिस प्रकार हुठी स्वभाव होता है परन्तु वह हमेशा हठ नही करते, कुछ यही स्वभाव श्री द्विवेदी का भी था । उनमे भी प्रतिद्वन्द्ता का भाव जाग चुका था परन्तु उनका यह स्वभाव हमेशा नहीं बना रह सका । पढने को अपेक्षा इन्हे प्रकृति प्रागण में अकेले घूमना अधिक अच्छा लगता था । देहाती मदरसे मे इन्हे उत्तरा- घिकार के रूप में काव्य का प्रेम तथा आदर्श का आभास मिला था । परन्तु स्वभाव लजालू और झेंपू था । वह सबके अहकार का भार वहन करते-करते स्वय अह शुन्य होगये थे। प्रारम्भ से ही द्विवेदी आत्मलीन, भावुक व्यक्ति थे । थे काव्य प्रेमी थे और भावना के भीतर से जीवन का स्पशं चाहते थे । इसके साथ ही इनकी वृत्ति कोमला थी । बचपन मे प्रकृति की निद्दन्द्ता और प्रफुल्लता के वातावरण के आभास १ दे० “'नवजीवन' हिन्दी दैनिक में श्री रजन सुरि दवे लिखित 'शातिप्रिय द्विवेदी व्यक्तित्व और कृतित्व' शीषंक निबन्ध, ७ अगस्त सनू १९६९ ।




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