जीन ज्ञान प्रकाश | Jeen Gyaan Prakash
श्रेणी : जैन धर्म / Jain Dharm

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Add Infomation AboutMukundchand Jashkaran Chindaliya
लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
6 MB
कुल पष्ठ :
248
श्रेणी :
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No Information available about मुकुंद्चंद जशकरण चिन्डालिया -Mukundchand Jashkaran Chindaliya
पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)( है )
॥ दोहा ॥
'अझंजना सती तिण अवसरे, वेठी सामायिक सांय ।
कर्म घर्म संभालती, रही घर्म लव लय्ाय ॥
बसंतमाला तिण अवसरे, हाथ जोड़ौ कड़े आम ।
सती रे सामायिक तिहां लगे, राजा करो विश्राम ॥१॥
॥ ढाठ तेहिज देशी ॥
हिवे अंजना सामायिक पूरी करो, हाथ जोड़ी
लागे पिउ ने पायक । पवनजौ कड़े तू' सोटोौ सती,
लौन रही शौजिन घम मांहिक ॥ वचन वरां से मै'
टूचवी, मैं' तने कौघो अभाव अगाधक । हाथ जोड़ी
करू' विनती, खमज्यों सती स्हारो अपराधक ॥ स० ॥
४२ ॥ अंजना पाय नमी कहै, एहवा बाल बाला कांड
स्वामक । जहवी प्रग तयो साजड़ौ, तेहवी पुरुषने स्त्री
जायक ॥ हाथ जोड़ी ने आय उभीौ रही; सधुर सुह्ा-
मगा बोलती वेणक ।. कहे प्राप्ति विण किम पामिये,
जाणे पत्थर गाली ने कौधो छे मैगाक ॥ स० ॥ 8३ पे
तौन दिवस रह्मा तिहां पवनजौ, तिह्ां भाव भगति
तियण कौप्नी विशेषक। वाय ठोले बौंकने करी, षटरस
भोजन आपिया अनेकक ॥ 'हाव भाव करे छे अ'जना,
प्रौतम सू' घणौ सांचवी रौतक । पवनजी आनन्द पास्या
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