मुझे चाँद चाहिये की भाषा संरचना का शैली तात्त्विक अनुशीलन | Mujhe Chand Chahiye Ki Bhasha Sanrachana Ka Shaiali Tatttvik Anuseelan

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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//9// हताश जौवन का दु:ख- दारिद्रय इन पंक्तियों में साकार हो उठा है। हीरो का घर पहुँच कर रूक जाना, घर के अन्य लोगों को गतिशील बना देता है। सभी चंचल हो उठते. हैं- सबके हाथ भरे हुए हैं- स्वागत- सत्कार के लिए रूपा पानी लेकर दौड़ी है, सोना के हाथ में चिलम है ,. धनिया के हाथ में चेतना और नमक है- सभी प्रफुल्लित हैं, आहादित हैं, आनन्दित हैं-सभी आशान्वित हैं आशा भरी आँखों से होरी को देखने लगीं, नहीं, ताकने लगी ताकने लगी'- “ताकने लगी में आशान्विता भी है, याचना भी है- और, इस आशा उल्लास के समक्ष लज्जित- ग्लानित ' 'होरी उदास बेठा था”- मानो हत्या करके आया हो” - उसने सचमुच हत्या भले ही न की हो, मर! इन प्राणियों की आशा - अभिलाषा की गर्दन तो उसने दबा ही दी है, और इसी का नतीजा है कि निया सिर से पॉव तक भस्म हो उठी।. मन में ऐसा उद्देग उठा के अपना मुँह नोंच ले। यहाँ तक किए गए विवेचन का यह निष्कर्ष है कि उपन्यास के उपादानों में भाषा एक महत्वपूर्ण उपादान है और उसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती है। अन्य साहित्य रूपों की अपेक्षा उपन्यास को भाषा अत्यन्त लचीली और विविध धर्मी होती है। अन्य विधाओं से उपन्यास की भाषा की एक विभेदक रेखा भी है। यथार्थ और उपन्यास की भाषा आज उपन्यास को यथार्थ की बहुविद्य अभिव्यंजनकारी विद्या माना जाता है। फलत: उपन्यास की भाषा पर चतुर्दिक यथार्थ का बेहद दबाव है। इस दबाव को उपन्यासकार प्रतिक्षण अनुभव कर रहा है। इस सन्दर्भ में डॉ0 परमानन्द श्रीवास्तव के निष्कर्षो के रूप में कहा जा सकता है। सामाजिक यथार्थ और कंथा भाषा की अवधारणा और स्वरूप पर एक गोष्ठी का आयोजन वत्सलनिधि के अन्तर्गत गया में हुआ था। इस गोष्ठी में अज्ञेय समेत अन्य कई रचनाकारों और समीक्षकों ने समकालीन उपन्यासों में बदलते भाषा के रचनात्मक पक्ष पर गहन गम्भीर मैथन किया था। इसमें प्रेमचंद से लेकर जैनेन्द्र और बाद के उपन्यासकारों की भाषा पर विस्तार से विचार किया गया था। बाद में इन निबन्धों और लेखों का प्रकाशन सामाजिक यथार्थ और कथाभाषा शीर्षक से किया गया। _ इस पुस्तक में संकलित निबन्धों के अनुशीलन से कथाभाषा की अवधारणा और उसके स्वरूप पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है। और इस मंथन से प्राप्त निष्कर्ष, के आधार पर इस कारण की खोजबीन सहजता से की जा सकती है। कि मेरा जो प्रतिपाद्य है उस उपन्यास की भाषिक रचना इस तरह की क्यों है। *. 1. सामाजिक यथार्थ और कथा-भाषा, सं0 सच्चिदानन्द वात्स्यायन, पृष्ठ 37.




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