दसवीं से तेरहवीं शताब्दी के समकालीन हिन्दी साहित्य के आधार पर उत्तर भारतीय समाज में ..... | Dasvin se Terahvin Shatabdi Ke samkalin hindi sahitya ke aadhar par utter bhartiya samaj me

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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विधि-विधानो मे जटिलता का समावेश होने लगा था।*”' किन्तु फिर भी धार्मिक-कृत्यो में पति के साथ पली की उपस्थिति आवश्यक समझी जाती थी।* इस प्रकार ब्राह्मण काल सम्भवत' खियो की स्थिति के सन्दर्भ में सक्रान्ति काल था, धार्मिक क्रियाओं में जटिलता और विभिन्न सामाजिक-संस्थाओं के विकसित होने के कारण ख्रियों का कार्यक्षेत्र धीरे-धीरे सीमित होता जा रहा था, किन्तु अब भी ख्री धार्मिक कार्यों मे पुरुष की सहधर्मिणी भी ।” यास्क के अनुसार यदि किसी पुरुष का पुत्र न हो तो इसकी विवाहिता पुत्री पिता की अत्येष्टि-क्रिया कर सकती थी। हिन्दू समाज मे आदिकाल से बहुविवाह की प्रथा रही है, कऋग्वैदिक समाज मे भी अभिजात वर्ग के पुरुष कई पत्नियों रखते थे।* ऋग्वेद में हमें विधवा शब्द का प्रयोग अवश्य मिलता है किन्तु उसकी सामाजिक स्थिति का कोई विशेष बोध नहीं होता ।*' वैदिक कालीन साहित्य से विदित होता है कि पुनर्विवाह तत्कालीन समाज 41 शतपथ ब्राह्मण - 1.1.4 13 42. ऐतरेय ब्राह्मण 1 2 5; शतपथ ब्राह्मण 5.1.6 10 43. अल्तेकर वुमन पोजीशन इन हिन्दू सिविलाइजेशन पृ-202 44. ऋगणेद 1.62 11, 1 71.1, 1,104 3, 1.105.8, 1.112.19, 1.168-8-6, 53, 4 45, ऋगवेद 1/87/31, एक स्थान पर वर्णन है कि मख्त के वेग से जिस प्रकार पृथ्वी कॉपने लगती है उसी प्रकार पति से विछोह होने (मृत्यु होने) पर ख्री दुःख अथवा दुर्व्यवहार के भय से कॉपती है। (11 )




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