भक्ति और प्रपत्तिका स्वरुपगत भेद | Bhakti Aur Prapttika Swarup Bhed

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Bhakti Aur Prapttika Swarup Bhed by रमानाथ शास्त्री - Ramanath Shastri

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( रै9) भक्ति और प्रपत्तिका-- हक किंवा पापाइंहरण स्व किंवा मोक्ष आदि अलौकिक प्रयोजन भा भाक्तका उद्ददय न रहना चाहिये । क्यों के ' भाक्तिर भजनानहामुत्र फलभागनराइयनामाप्मन्मन कल्पनसू 2 इत्याद शतम तथा * डानि पंसाधापंना विष्णा *ै * भक्त्यां स्वनन्यया * * अनिमित्ता भागवती ' इत्याद म्साव पूराणायें निष्काम भाक्तकराहां ।वघान है । * श्रवण कातन विष्णा समरपरयम्रधडवध:' से काम. पापर। ८ ेजसमन, आलजकशममकलक््रअधा न प- पपकतपपरसाती इत्याद प्रसुटादक चचनतम * आपता ” झाबद ह। अधात भग- वानम अप करत नए भाक्त करना चाय एसपा कहा ह्। सचा करत समग्र उस संबा या न्वघा भाक्त का मगबान में हा स्थित रखना चाहय, प्हां से उठालिना न चाहय । भाक करक जा लाग भगवान्‌ स किसी भी फलकों चाहना करत है व उप भाक्तका भगयान्‌ के पास से हटा कर अपने पास हा ललत है | सवा कर श्रामगवान्‌ में हा ऑआत रखनी चाहय । एसा भाक्त आनिमित्ता कहीं जाती है । नामत्ता हाकरभा फिर यह भागवता होनी चाहिये । अथात्‌ का नि्विशष निधमेत्र फिंचा आनित्याल्पगण चर तु; भाक्त का विषय नहीं हाना चा'हये किन्त सर्वान पड़श्वय संथन्न का [नत्यानन्त कर्याणगुण पुरुषात्तपह्ी उपको वि» लेययसफाकननयनाा किन दिनकर लि कि जा किम वाहन अप: हम, का ाकर्डर जद 4: 8, व नया, मगवाननामत्ता वा | सगवतः «८ शत, फलान नामत्तापरनि याझानिन मिच्ष सा मक्तिभवदी त्यतरेण सम्बन्ध:




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