भ्रमरगीत और सूर | Bharmargeet Aur Soor

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Bharmargeet Aur Soor by देवेन्द्र कुमार - Devendra Kumar

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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ं २ | (मु सुर के समस्त पदों के संग्रह का नाम है “सूरसागर' । परम्परा के हाथों संग्रहीत और सम्पादकों द्वारा सम्पादित इन पदों में सुर के अपने कितने पद हैं और कितने प्राए-- यह बताना प्राय: अब असंभव है भौर यह कहना भी कठिन है कि “सुर- सागर' साम की सा्थकता का वास्तविक कारण बया है ? यह उसकी निःसीमता को बताता है, था अनुभूतियों की गहराइयों और गतिमान तीव्रता को ? लेकिन केवल सीमाहीनता किसी काव्य का नाम नहीं वन सकती । यदि नाम का कारण दूसरे विकल्प को माना जाय और मेरे विधार में जो माना जाना चाहिए तो वह “लीला पढों' के कारण ही; विद्षेपत: कृष्ण को मानवी लीलाओं के कारण ही माना जा सकता है । फिर भी यह ध्यान में रखना होगा कि सुरसागर' के पदों का क्रम, नाम और विभाजन का सम्बन्ध काव्य-प्रक्रिया से नहीं संपादन-प्रक्रिया से है । “विनय के पदों' का अपना विशिष्ट संदर्भ है और प्रयोजन है। यों पद किसी कला या क्रमवद्धता के कायल नहीं हैं । उनमें कवि अपने आपको सीधे अपने आराध्य से आत्मनिवेदन करने की स्थिति में अपने आपको पाता है परन्तु लीला पदों मे एक आधार है और कथा का अनुबंध भी । इस कथा का मुख्य उद्देश्य कृष्ण के चरित्र का क्रमिक विकास दिखाना है, विज्वेपफर उनकी मान की लीलाओं के व्यक्ति पक्ष का । वह भी प्रेमाभक्ति के संदर्भ में । यथार्थ में सूर-साहित्य के संपादक भौर मूर्घन्य भालोचक जिसे “श्रमर गीत' कहते है, वह छृप्ण की मानवीय लीलाओं की अंतिम प्रतिक्रिया और परिणति है । संयोग के संदर्भ में कवि प्रेम” की जिन वाह्म स्थितियों और संयोग क्रीड़ाओं के चित्र अकित करता है, वियोग के संदर्भ में उन्ही की आन्तरिक स्थितियों प्रतिक्रियाओं और भनुभूतियों को प्रतिविस्वित देखा जा सकता है, मत: ्रमरगीत एक स्वतंत्र अझ्य न. होकर लीनाकाव्य के उद्देश्य का ही अंश है । यह लीलाकाव्य सुर सागर के तीन चंीथवाई भाग को घेरता है । भागवत के अनुसार सूरसागर में भी वारह अध्याय हैं परन्तु विनय के पदों के वाद शेप ग्यारह अध्याय, सुरसागर के दसवें अध्याय के दसवें हिस्से के वरावर भी नहीं है । दसर्वाँ अध्याय पुरा का पूरा क़ृप्ण की मानवी लीताओं के दिए अपित है। क्षमरगीत उसी का एक हृत्वपुर्ण भौर मामिक संदर्भ है। वियोग की एप्टभूमि में श्रमरगीत की वस्तु एक उत्पाद कथावस्तु है । है. । इसमें कवि के साधारणत: दो उद्देश्य माने जाते है। एक तो कृष्ण के वियोग में प्रजो की




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