मानसिक ब्रह्मचर्य अथवा कर्मयोग | Mansik Brahmcharya Athva Karmyog
श्रेणी : इतिहास / History

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
20 MB
कुल पष्ठ :
712
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)( हुडे )
क्तन्नता श्रकाशनमानसिक न्रह्मचये अथवा कर्मयोग नामक घिषय को सन्नन्न
बनाने के लिये माता-पिता की श्रोर से जो खुविधा तथा स्वत-
स्त्रता मुक्े मिली है, उनका मिलना किसी भी सन्तान को
दुर्लभ है । उन्होंने ४५ वर्ष तक मेरा लालन-पालन किया, २५
वर्ष तक गंभीर रोगों के आक्रमणों से मेरी रक्ता की 'और
घन, वस्त्र, यान; छोषधी, चिकित्सक और शुश्रूपक नौकरों श्मादि
की ओर से कभी चिंतित नहीं होने दिया। उन्होंने कभी सुझ
से घनाजंन करने की मांग नहीं की । मे अपने खाने-पीने,
सोने, श्रमण करने और श्रपने विषय में मग्न रहा करता था |
_ जो दूसरों के लिये कुछ नही था, परन्ठु मेरे लिये सब कुछ था |
मुभे न घर की-ब्यवस्था की चिन्ता थी और न-हि सामाजिक
घ्ादि कार्वो से प्रयोजन था । इस प्रकार साता-पिता की
छोर से मुभे पूर्ण स्वतन्त्रता तथा सुविधा मिली हुई थी ।
जिनकी अपार कृपा से में झपने विषय को सस्पन्त बनाकर
पंथ के रूप में जनता के सन्मुख रख रहा हूँ । उनका में अत्यन्त
आशभारी हूँ । जिससे मुक्त होना अत्यंत दुष्कर है। फिर भी
जहाँ तक हो सके मुझे उनकी सेवा करनी चाहिए। यदि मे
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