परिषद निबन्धावली भाग - 1 | Parishad Nibandhawali Bhag - 1

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Parishad Nibandhawali Bhag - 1  by धीरेन्द्र वर्मा - Dheerendra Verma

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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घर्तमान-दिन्दी-पंचरत्न श्र रही है, न्ज्भाषा के गय तथा पद्य का खुरोला एवं रसीला गान सखदु झ्ौर मंद होने के कारण सुनाई ही नहीं पड़ता ॥ केवल कुछ ही मधुर स्वंदर्य के प्रेमी, तथा प्राचीन नीति-रीति के नेमी रसिक सज्जन उसके राग में शनुरक्त हैं, साधारणतया तेा सब लेाग उससे विरक्त ही दिखलाई देते हैं । खड़ी वाली '्ौर वज्मापा की तुलना करना हमें यहाँ ध्पमोष नहीं, तथापि हम यहाँ पर इतना प्पवश्य कद देना चाहते हें कि चजभापषा में जैसा माधुर्य है वैसा खड्री वाली में कदापि नहीं, यह्द न केवल हमारी ही धारणा हे वरन्‌ श्पनेकानेक विद्वानों एवं सादित्यममंक्ञों का भी यद्दी मत पवं विचार है* । बजभापषा में एक सरस स्वाभाविक एवं सरल घारावादि ६ ता; है वह खड़ी वाली में नहीं मिलती, यद्दी उसके ऐसे मोहन मंत्र दैं जे प्रत्येक रसिक हृदय के अपनी श्रार झाकू् कर उसे वजभापा का प्रेमी श्यौर नेमी वना लेते हैं । इन्दीं के कारण ध्याज भी ऊुक कविर्त्न तथा सरसता के चापक प्रेमी पाठक वजभाषा ही में कविता रचते रचातें तथा सुनते खुनातें हैं. श्रौर च जमापा के साहित्य तथा उसको कविता का पालन- चापण कर उसकी रक्ता किये चले जा रदे हैं । श्र यद्द भी प्रयलल हो चला है कि बजभाषा का पुनरुद्धार तथा कविता में तत्संचार- प्रचार किया जावे, नहीं तो कुछ दी समय पूर्व इसे ता विस्द्ति के श्ंघकूप में डाल देने की हो वात वेग से फैल रददी थी श्योर पतदर्थ प्रयास भी प्रचलता से दुद्धा था । बड़े संता प, प्रसन्नता जैसे पं० प्रतापनारायय मिश्यादि ।




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