मृत्युञ्जय महावीर | Mrityunjay Mahaveer

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Mrityunjay Mahaveer by निर्दोष हिसारी - Nirdosh Hisari

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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15 होते थे । यू त॑ क्रीड़ा, मदिरापान, और आंखेट करना सामन्तों के प्रिय व्यसन थे । सभी एक दूसरे का यथाशक्ति शोषण करते थे । नारी की स्थिति अत्यन्त दयनीय थी । कहने को तो वह अर्द्धागिनी थी, पर वास्तव में -- 'दिन को दासी निशि को भोग्या' ही थी । दास प्रथा का भी प्रचलन था । क्रीत दासों की स्थिति तो पशुओं से भी गई बीती थी । स्वामी छोटी-छोटी भुलों पर उन्हें कठोर दण्ड देते थे । ये देहदण्ड तो दासों पर स्वामियों की कृपा होती थी, क्योंकि वे चाहते तो मृत्यु दण्ड भी दे सकते थे . चम्पा नरेश की राजकुमारी चन्दन वाला को बाजार में खुले आम नीलाम करके वेचा गया था । जब उसकी सुन्दरता उसकी स्वामिनी के लिए ईर्ष्या का कारण बनी तो उसने “नाई को बुलवा कर उस की केशराशि को कटवा दिया था और उसके पैर बंधवा कर उसे तलघर में बन्द करवा दिया ।! “चीजों सम बिकते थे मानव, मानव का कुछ मोल नहीं था । मुक॒ ढोर से. जीवन ढोते, उनके मुख में बोल नहीं था ॥। राजाओं को अपनी ऐय्याशी और निरन्तर होते रहने वाले युद्धों के लिए हर समय धन की भावश्यकता रहती थी । जन-साधारण ही धन। सरिता का उद्गम होता है अतः आए दिन उन पर कर लगाए जाते उत्पादन कम होता था, क्योंकि राजनैतिक स्थिति अस्थिर रहती थी । इसलिए “कुछ जन मौज उड़ाया करते, वहुजन थे पर भूखे मरते । राजा लोग अपनी अनावश्यक आवइयकताओं में व्यस्त रहते थे । उन्हें प्रजा के सुख-दुख की ओर ध्यान देने का अवकाश ही कहां मिलता था । उन की चिन्ता केवल यह थी, आय अधिक हो, अधिक आय हो। राज कर्मचारी स्वामी की इस चिन्ता को टूर करने के लिए दुखी प्रजा को अल्प आप पर 'कर' कुछ और लगा देते थे । महावीर स्वयं राजपुरुप थे । उनका परिवेश इन सभी दुबलताओं और हीनताओं का परिवेश था । वह उदारमना और चिन्तनशील प्राणी 1. चौबीस तीर्थंकर, पृष्ठ 112, लेखक--डाक्टर गोकुल चन्द्र जैन ।




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