धर्म - नीति | Dharm-neeti

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Dharm-neeti by अज्ञात - Unknown

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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नीति-धर्मं उसे खबर दी कि लड़ाई जीत छी नई इस सूचनापर पेम्ब्रोक बोठ उठा, “अर्वितॉपिशि/ हाथ भलूमनसी नहीं बरती । मुक्त जो मान मिलता वह आपने मैं. हाथसे छीन लिया; मुक्ते लड़ाईमें शामिल होनेको बुलाया तो फिर मेरे पहुंचनेके पहले लड़ाई न लड़नी थी ।” इस प्रकार नीतिमागंमें जब किसीको जिम्मेदारी छेनेका हौसला हो तभी वह उस रास्तेपर चल सकेगा । खुदा या इंश्वर सर्वशक्तिमान्‌ है, संपूर्ण है, उसके बड़प्पन, उसकी दया, उसके न्यायकी सीमा नही है । अगर ऐसी बात है तो हम लोग जो उसके बंदे समझें जाते हे, नीतिमार्गको कैसे छोड़ सकते हें ? नीतिका आचरण करनेवाला विफल हो तो इसमें कुछ नीतिका दोष नहीं हू, बल्कि जो लोग नीति भंग करते हैं वे ही अपने आपको दोषभाजन बनाते हैं । नीतिमारगंमें नीतिंका पालन करके उसका प्रति- फल प्राप्त करनेकी बात आती ही नहीं । मनुष्य कोई भा काम करता हूं तो शञाबाशी पानेंके, लिए « नहीं, वल्कि इसलिए कि भलाई किए बिना उससे रहा नहीं जाता । खूराक और भलाई दोनोंकी तुलना करने पर भलाई ऊंचे प्रकारका आहार सिद्ध होगी और कोई दूसरा आदमी भलाई करनेका अवसर




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