राष्ट भाषा की शिक्षा | Rashtra - Bhasha Ki Shiksha

55/10 Ratings. 1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Rashtra - Bhasha Ki Shiksha by श्रीधरनाथ मुकर्जी - Shredhar Mukarji

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about श्रीधरनाथ मुकर्जी - Shredhar Mukarji

Add Infomation AboutShredhar Mukarji

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
भाषा इतना ही नहीं, वरन्‌ सम्यता के प्रारम्भ से आजतक का सम्पूर्ण ज्ञान शाब्स-के साधन से ही अटूट रहा है । पुरानी पीढ़ियों अवश्य नर हुई, पर ज्ञान का मण्डार बढ़ता. ही रह, और मनुप्य अपने पूर्वजों के अर्जित ज्ञान का लाम सदा उठाता ही रहा | यह प्राधिकार मनुष्य जाति की बीती --- पैतिक सम्पत्ति -- हैं । पु अपने पूर्वजा के ज्ञान का लाम नहीं उठा सकते है । फछतः उनका जीवन इतिहास-यूत्य हैं | थ इस प्रकार भाषा की निम्न लिखित विद्योपताएँ: है : १ मापा के कारण सानव-जाति पनु-वर्ग से ऊँची है । ). मापा के द्वारा सामाजिक तथा राष्ट्रीय एकता की स्रि हुई है ) भाषा के द्वारा ही हम अपने विचार प्रकट कर सकते है । ) भाषा ज्ञान की प्राप्ति और उसकी इद्धि का प्रमुख साधन है । न्तच्ति प्र # ही ली हा कि ४. साधा और सस्पता भाषा का उत्थान और पतन किसी भी देन की बढ़ती और घटती पर निर्भर रहता है । हमारे देदय में गुप्त-वंग-काल सभ्यता का स्व्ण-युग समझा जाता है। इसी समय हमारे देद मे सस्कृत भाषा के उत्कप्ट काव्य लिखे गये थे । इंग्लैंड में प्रथम एलिजावेथ के समय शेक्सपियर, वाल्टर रैठे तथा वैकन सरीखे महान्‌ , लेखक हुए | फ्रास में चौदहवें छुई के समय कवियों तथा लेखकों की भरमार थी | कारण स्पष्ट ही है । हम सब जानते ही है कि विद्या का प्रचार तभी ठीक ठीक हो सकता है, जब कि देद्य म सम्पूर्ण लान्ति रहे । लेखक तभी निकलते है, जत्र विद्या का उचित प्रचार हो और वे द्यान्ति-पूर्वक लिख सके । अवश्य, कभी कमी साम्राज्य के व्वेस के कारण भाषा के प्रसार मे सहायता मिलती है, जैसा कि सुगूल-साम्राज्य के पतन के पत्चात्‌ हिन्दी की खड़ी बोली का हुआ । अनेक उू-क्ायर दिल्ली को छोड़कर लखनऊ, फैजावाद, प्रयाग, काथी, पटना सादि पूर्वी झहरो मे जा बसे । दिल्ली के बहुत से व्यापारी भी इन दाहरो में जाकर रहने छंगे । इस प्रकार दिल्ली की खड़ी चोली का ग्रचार बदा * | हम सदेव अवध्य स्मरण रखना चाहिए कि भाषा प्रगतिद्ील हैं। किसी भी भाषा का विकास शियु की भाषा की नाई होता है। छियु सारम्म में टूटी-फूठी भाषा वोलता है; पर धीरे-धीरे नवीन गव्दावलीं पाकर उसका मापा-ज्ञान उत्तरोत्तर बढ़ता * रामचन्द्र शुक्ल : हिन्दी साहित्य का इतिहास; काशी, नागरी प्रचारिणी सभा, पृष्ठ ४०८ 1




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now