नीरजा | Neeraja
श्रेणी : साहित्य / Literature

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
6 MB
कुल पष्ठ :
100
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)श्र
अस्थिर हो उठा । क्रोध-कम्पित स्वर में बोला--'नीरजा-- तुम जाओ
यहाँ से । तुम यहाँ कभी न आया करो । तुम” और उसका स्वर
अवरुद्ध हो चला ।
नीरजा ने अमिताभ को गौर से देखा और फिर मौत, मूक, सिर
डाले कमरे से अह्िस्ता-अहिस्ता चली गई । उसके जाते ही अमिताभ ने
पास पड़े स्ट्ूल पर सिर टेक दिया और बालों को नोंच डाला ।
रे
जब टाइम-पीस की सुई खिसककर साढ़े सात पर आ गई तो
अमिताभ ने सामने रखी चाय को ढकेल दिया । जान लिया नीरजा अब
नहीं ायेगी, कि नीरजा सुबह की चाय शायद आज से उसके यहाँ
नहीं लेगी, कि नीरजा को कुछ बुरा-सा लग गया है, कि नीरजा बहुत
ही मानिनी है !
और बिना नीरजा के चाय पी लेना अमिताभ को कुछ जँचता नहीं,
चाय गले से नीचे उतरती ही नहीं । विचित्र आदत हो गई हैं। वह
भी मानता है कि बुरी श्रादत है यह--दिमाग से श्रघिक दिल को,
भावना को स्थान दे बंठना ! पर आदत की अच्छाई व बुराई को गौण
समभकर, वह वही करता है, जो मानता है । जो मानता है, वह्दी करता
चला जाता है-निद्न्द, अनवरत ! सामान्य हुम्रा कि सुन्दर है ।'
एक सिगरेट सुलगा, वह नीरजा की वृद्धा माँ के उस अधूरे पड़े
चित्र के सम्मुख जाकर बैठा ही था कि नीरजा की ब्रृद्धा माँ आ गईं ।
कहने लगीं--अब तु ही बता श्रमिताभ, मुझे जलाने में भला इस
'लीरजा को कौन खास आनन्द मिलता है ?'
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