प्रस्तुतर प्रश्न | Prastut Prashan

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
9.18 MB
कुल पष्ठ :
298
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)४-शासन-तन्त्रषिचार
प्रश्न--दोप वास्तव में स्वयं लोगों की दी अनेतिकता का दै,
उस प्रथा (5प्र5८€ए0) का क्या दोप है ? यदि प्रथा का है, तो छाप _
अन्य कौन-सी प्रथा तजवीज करेंगे ?
उत्तर--दोप किसका कद्दा छात्र £ विज्ञान-शुद्ध यह कहना होगा कि
नुनाव-विधान श्रौर एतत्कालिक लोक-स्थिति, ये दोनों परस्पर विषम सिद्ध
होरहेंहें।
लोगों को विधान के श्रनुकूल बनाया जाय या विधान को ही लोकस्थिति
के श्रनुकूल बनाया जाय १--यद प्रस्तुत प्रश्न नहीं है । और यदद व्यावहारिक
राजनीति का भी प्रश्न नहीं है । राजनीति का सम्बन्ध तात्कालिक संभव से
है, श्रागामी उचित से नहीं ।
श्राल सचमुच राह नहीं सूकती कि चुनाव-प्रथा से किस रूप में सम-
भौता करें कि उसके दोप से वच्चा ला सके श्र उसकी सुविधाएँ प्राप्त हो
जाये । ऐसा भी मालूम होता है कि लौकिक तल पर, श्रर्थात् राजनीति के
तल पर, जन-संख्या का सिद्धान्त किसी-न-किसी रूप में स्त्रीकार किये ही
गुज्ञारा है । क्योंकि राजनीति लोगों की भौतिक श्रावश्यकताश्ों के प्रश्न को
सामने रखकर चलने का वाध्य है, श्रौर वैसी श्रावश्यकताएँ सव में हैं श्रौर
सब में लगमग एक-सी ही हैं । सभी के पेट है, सभी को खाना चाहिए ।
सभी के तन है, सभी को कपड़ा-लता मी चाहिए, । इस मामले में ऊँच-नीच,
श्रमीर-गरीव, दुप-साधु सब समान हैं । इस तरह राजनीति मुख्यतः संख्या
का प्रश्न है ।
पर संख्या गड़चढ़ भी डाल देगी | लन-तन्त्र में भीड़-बृत्ति का फल भी
देखने में आ्राता है । डिक्टेटर-शिप उसी की प्रतिक्रिया है । फिर भी तमाशा
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