प्रवचनसार प्रकाश | Pravachansar Prakash

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कुन्दकुन्दाचार्य - Kundkundacharya

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वैद्य प्रभुदयाल कासलीवाल - Vaidya Prabhudayal Kasliwal

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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' प्रवंचनसार प्रकाश हु क्षायिक ज्ञान का लक्षण-- युगपतु , श्रात्म प्रदेशों से, विषम विचित्र द्रव्य जाने । तात्कालिकं श्रौर धन्य सभी 'को, क्षायिक ज्ञान उसे माने” ॥47।॥। एक साथ तोन लोक तीन काल के दव्यों को एक साथ न जानने वाला एके इ्ंवय भी पर्याय सहित नहीं जानता-- जो नहीं जाने युगपतु सारे तीन काल के द्रव्यों को । जान सके नहीं वह जग में पर्याय सहित एक को भी ॥481॥ .. इव्य की श्रनन्त जाति है एक द्रव्य को झ्नन्त पर्याय है । इनको केवली एक साथ जानते हैं”. प्रनन्त पर्यायी श्रात्म द्रव्य को द्रव्य समूह अचन्तों को । जो युगपत्‌ नहीं जाने कोई, वह॒कसे जाने सबको ।1491। झात्मज्ञान परावलम्बी नहीं है- / ४ . झात्मज्ञान उत्पन्न यदि हो, क्रमश: पदाथें श्रवलम्बन ले । न तो वह क्षायिक नित्य नद्दीं है श्ौर सवेगत भी नहीं रे ॥1501। जिनवर के ज्ञान की सहिमा-- तीन काल के सदा विषम जो स्व क्षेत्र के विविध पदाथे । जिनवर युगपतु ज्ञान से जाने, ज्ञान की महिमा झपरम्पार ॥511। ज्ञानी श्रात्मा द्रव्यों का केवल ज्ञाता दृष्टा होता है द्रव्य रूप परिणमन नहीं करता रत: बन्घ नहीं होता-- जानता हुमा सभी द्रव्यों को परिणमे नहीं झात्म.उस रूप । ग्रहण श्रौर उत्पन्न न. करता श्रतः श्रबन्घक उसका - रूप -1॥152।। ज्ञान श्रौर सुंखको हेयोपादेयता का वरंन करते हैं- पदार्थ सम्बन्धी ज्ञान भ्रतीन्द्रिय ऐन्द्रिय मु्ते असुर्ते तू जान । ' ' इसी तरह से सुख भी होता, उपादेय उत्कृष्ट प्रधान ॥5311 प्रत्यक्ष ज्ञान को परिभावा-- दर्शक का जो ज्ञान, अमुर्ते को सूर्तों में भी श्रतीन्द्रिय को.। प्रच्छन्न सकल स्व पर को देखे, प्रत्यक्ष कहो उस शान ही को ॥841।




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