गीतादर्शन | Geeta Darshan

Geeta Darshan by लाला कन्नोमल - Lala Kannomal

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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वबंक्तब्य 1 का परेड का सष्रि ्यौर व्वय, घ्यात्मा छोर परमात्मा से सस्वन्ध रखने वाला समन्न ज्ञान प्राप्त कर लेचा छ्ञानार्जन की पणटाकाए़ा हैं । ब्यकेसा खत शब्द इतना व्यापक हैं कि ऊडइ़-चेतन, जो कु हमारी ज्ञामेन्द्धियों का 'विपय हैं, सभी का समावेश उस में हो जाता है । तिनके से लेकर पव्चेत तक, पिपीलका से लेकर विशात्सकाय हाथी तक, तारका सर 'लेकर सूर्य्यमणुडव्ल तक-खभी सृष्टि के अन्तर्गत है । छुद्र से ज्ुद वस्तु च्झाभी स्वामी ज्ञान पाप करना जब सचुप्य के लिये उसम्सय सता ट तव इस सारे विन्च का यथा शान कोई के वे पान कर सकता है । पर उसकी प्राप्ति के लिये घयल करना ही मजुप्य-जन्स की सार्थकता है ।. क्योंकि ईश्वर श्ञानसय है बोर सजुप्य इंश्वरही का छण है । सचुप्य ही क्यों; जहां जहां कान का सश--नचादहे दितना ही अच्प क्यों न हो- पाया जाता हैं चर्दा चर्हा स्र्चन, ईशवरसंश व; घारिवित्व खसस्सना चवाहिप्ए। ब्यतपुव घ्यपपते ज्ञानोद्धच के कारण ब्यथवा ब्याक्रर, क्ञानेरूपी जगदीशबर: च्ही पहचान के लिए--उस में ब्पनी झात्सा के लय के लिए--नचेम्म करना सचुप्य का सब से चड़ा कर्तव्य है । प्टि-स्थिति आदि के नियम सखमस्प्ने आर उन के द्वारा स्नप्टा च्छे ब्यर्तित्व वही सावना इत्पट्ल पर घ्यद्धिति करने के लिप ज्ञान-प्राति के सिया घर कोई साधन नहीं । पररूंति के ं में दानवानों को ब्लदा एकसी संत्थता का बदुमत होता है। ज्ञाद च्यीर सत्य प्रायः पय्यीय- चाची शब्द हैं। कवोंकि घाछतिक सलियसों से सत्य का झजुसव होना दी ज्ञान का घ्यनुमव कहाजाता है 1 चात यह है दि सत्य की उपलब्धि ही




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