अवतारवाद मीमांसा | Avtarvad Mimansa

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Avtarvad Mimansa  by स्वामी दयानन्द -Swami Dayanand

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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झवतारधाद मीमांसा । श्पू कलीनरभययरथचफजीजपलथतफथलपकलथलय: लिप, कजधथतथतथातपथलकतपरिरथ ने मेरा शिर वाट लिया था झौर मदादेव का लिंग शाप सेगिर पड़ा था, बैसेद्दी राज विष्णु का शिर कटकर सप्ुद् में गिर गया! इन्द्रको खदस्र भगकी प्राप्ति हुई । वे स्थर्ग से पतित हुये शरीर मावसरोवर में कमल में घास किया । ये सब दुग्ख के भोक्ता हैं । हुःख कौन नहीं मोगता है ? झस्तुदेवी के कहने से देवता लोग एक घोड़े का श्र लाये और व्वष्टा नाम शिद्पीको दे दिया । उसने उस सरको धिष्णु के सर से जोड़ दिया और विष्णु भगवान ज्ञो उठे । इससे उनका नाम हयप्रोव पढ़ा 1पक बार विष्णु के पास लकेमी बठी थीं। उनके मुख को देखकर विष्णु बड़े जोरसे हँसे, लक्ष्मी बड़ी नाराज़ हुई । झ्ीर घोरे से कद कि दुन्दारा शिर गिर जाय । उन्हीं के शाप से उनका शिर कटा था अब भापलोग यदां देखते हैं कि विष्णु जो मर कर जी उठे हैं । वे सुख हुए के सोका हैं उन्हें भी शुभ झशुम कर्म का फहा भोगना पढ़ता दै। ये सब लक्षण जीव के हैं या ईएवर के हैं इसे पाठक स्वयं समकतें । इसमें झधिक बुदि लगाते फो घ्ावश्यकता नहीं । इस कथा से मी थे जीच विशेष दी ठदरते है ईश्वर नहीं !विष्णु सगधान ब्रह्म का ध्यान करते हैं।-- दे० मा सुकत्द १ झा०्प्राह्मा इरस्त्रयो देवा ध्यायन्तः कमपि श्रुवमू ।विध्णुश्चरत्यसाघुप्र॑ तपो घर्षोएयनेकश: ॥




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