देश - दीपक | Desh Deepak

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Desh Deepak by बलदेव प्रसाद शुक्ल - Baldev Prasad Shukl

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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1 चुद्धरे . ट एक दिन सौतम पीपल के पेड़ के नीचे ध्यान लगाये वेठें थे । उसी समय समीप के भूस्वामी की पन्नों सुजाता वहाँ पहुँची । उसने मन्नत सानी थी कि पुत्र दोने पर में वन-देवता को खीर खिलाऊँंगी । वही सन्नत पूरी करने के लिए वदद पायस लेकर झपनी सखी पराणा के साथ वन मे पहुँची । उसने गौतम को ध्यान में मभ्न वैठे देखा । समा कि मेरी पूजा अ्रहण करने को वनदेव प्रकर दो गये हैं । वड़ी श्रद्धा से उन्हें पायस झार्पित की गौतम ने उसे स्वीकार किया । उसके खाने से उनकी देह में चल झाया । फिर वे पद्मासन लगा कर उसी पीपल के नीचे ध्यान करने लगे । उन्दोंने पका निश्चय किया--चाहें मेरी खाल, नसें 'र दृड्ियों नप्र हो जायें; चाहे सारा रक्त और सांस सूख जाय किन्तु मे यहाँ से तभी उदगा जब मुझे पूरा ज्ञान दो जायगा । उनका मन एकाय्र हो गया 1 उस समय एक साथ सी गाजों ( बंज्चो ) के गिरने की घोर ध्वनि होती तो भी उनका ध्यान न टटता । इसी घीच उनके मन को विकारों वा चासनाश्रो ने अः! घेरा । उसके ऊपर 'सार' ने ध्याक्रमण किया । गोतम का मन शान्त रहा । चह्द 'मार' वी प्रेरणा से उत्पन्न विविध वासना सों से न डिगा। 'मार' हार गया । घापना सा मुंह ले कर चला गया | उस दिन वेशाख की पूर्णिमा थी । उसी दिन सिद्धार्थ को ज्ञान हुआ । उन्होंने कद्दा-- इस संसार में श्पनेक जन्म ले कर में ्रमणु करता निरन्तर (शरीर रूपी ) यूद-कारक लो टू ढता 'और चार-चार ( जन्म लेने का ) दुम्ख सहता रहा । 'अच सुमे चट यूदद-हारक दिखलायी पड़




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