ऋतु शेष | Ritushesh

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Ritushesh by राम अरोड़ा - Ram Arora

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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एक छिटका हुमा कालसाड/रै७ होकर, बिना बुछ कहें; उनके साथ चल पड़ी । सदा पदमा चावों में उसकी तरफ देखा तो उसने स्वत बता दिए कि चादिल उद्यान के पास उसने इस कार को रोका था भौर लिपट मागी थी । उहोन थोड़े सकोच के वाद हो उसे बैठाया, मगर 'दुष्टा' ने उसने बच्चे ही 'बेशामिया' शुरू कर दी । उसने ऐतराज किया तो उहोने गालियो देकर उसे 'वस चुप रहने” के लिए फटकार दिया, श्रोर जब वह चुप नहीं रही हो से यहा उतार दिया 1 उसने ध्यान से दवा । महिला मध्रेड, लवी-तगडी, ठोस श्रोर गठी देह दी थी, मगर बहुत फूहड चाल से चल रही थी । उस लिपट देने वालो का शायद इसलिए कृपा करनी पडो थी कि वह गमवत्ती थी । चह बडबडाते हुए बढ़े मजे से उनके साथ साथ चलने लगी ) पदुमा चाकी ने पूछा कहा जाना है श्रापको -माहिम बाजार | झापकों ? लेविंने वह भ्रपने प्रदन बा उत्तर पाये 'बिना गिडगिडा उठी--झाप लोग सुके साथ लेते घलिये मे ! -काई हज नही, लिये | पटमा चाका न कहा । ना, प्लीज भाप नहीं जाएदे मैं ब्सि मुसीबत में फसी हुई हू । घर मे मेरे दो छोटे बच्चे हैं श्रौर घोटी वहन है बस 1 श्र मेरा घरवाला अगर पहुंच गया तो उसने झपनी जवान काट ली ! लेकिन इसके साथ ही उसने उन दानों को देखा, जो उसे झपल देख रह थे । वह फोकी-सी हसी हसवर सफाई चने लगी--बुछ सही । में तो बसे हो कह रही भी 1 ध्ौर सहसा उसकी भालें सजल-सी हो गयी, भौर उसने चेहरा सीधा कर दिया. थोड़ी दर चाद वह फिर वडबडान लगी 1 ज् दोनो सहिलाश्ा के साय साथ चलता लुडरा ग्रपन एप हो बसी युस जाता, कभी उमय उठता । जद भी उसका हृदय उमगता, उसकी इच्छा हाती हि पेड महिला के एददम शिकट होकर बहे वि लावण्यमयी, बाप सलिन ने हैं, बस एक दार शरीर मुझे राजदार बना लें । फिर मैं सुगह शाम पापी न्ययाए सुनूगा, झापके घाद सीपूगा, श्रापका रोप सट्टा, श्रापको




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