शांति का शाश्वत मार्ग | Shanti Ka Shashwat Marg

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Shanti Ka Shashwat Marg by दिलीप वेदालंकार -Dilip Vedalankar

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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पढ्ड नलकाफाशोरशारशनशपरशविटटरटपपपपथ देता है-- समानी व आकूति: समाना दृदयानि व: । समानमस्तु वो मनों यथा व: सुसहासति।! नाज० 10,191 4 हे मनुष्य! ! तुम्हारे संकल्प समान हों, तुम्हारे हदय परस्पर मिले हुए हो तुम्हारे मन समान हों जिससे तुम लोग परस्पर मिलकर रहो । एकता तभी हो सकती है जब मनुष्यों के मन एक हों । वेदमन्त्रों में इसी मणसिक एकता पर बल दिया गया है | संगठन का यह पाठ केवल भारतीयों के लिए ही पहीं, अपितु धरती के सभी ममुष्यों के लिए है। संसार के सभी मनुष्य यदि बेद के इस आदेश पर आचरण करें तो संसार का कल्याण हो सकता है । कितना सुन्दर उपदेश है यह! यदि संसार के लोग इस उपदेश को अपना ले तो उपर्युक्त सभी कारण जिन्होंने मनुष्य को मनुष्य से पृथक कर रखा है, वे सब दूर हो सकते हैं, संसार स्वर्ग के सद्श बन सकता है। काश! संसार के मनुष्य इस उपदेश पर आचरण कर पाएँ । वेद के उपर्युक्त मन्तों के उपदेश से यह भली-भाँति सिद्ध हो जाता है कि वेद का सन्देश संकीर्णता, संकुचितता, पक्षपात, घृणा, 'जातीयता, प्राम्तीयता और साम्प्रदायिकता से कितना ऊँचा है! इसी से बिश्व-शान्ति सम्भव है। संसार का कोई अन्य तथाकथित धर्म-ग्रम्थ इसकी तुलना नहीं कर सकता। यही तो वेद का मानववाद है । अधर्सवेद के पृथिवीसुक्त में मानवसमाज का वर्णन करते हुए कहा गया है-- जन बिध्ती बहुधा विवाचसं नानाधर्माण पृथ्चिवी यशौकसम्‌। सहस्र॑ धारा द्रविणस्थ में दुहदां श्रुवेव धेनुरनपस्फुरम्ती ॥ -आअधर्व० 12.1 45 जैसे एक गृहस्थ में भिन्न-भिन्न स्त्री-पुरुष, भिन्न-भिन्न विचारों को रखते हुए और भिनन-भिन भाषाओं को बोलते हुए एकजुट होकर रहते हैं-- 'यथौकसम्‌', इसी प्रकार सम्पूर्ण मानवसमाज को भिन्न-भिन्न लिचारों तभा भिन्न-भिन्न भाषाभाषी होते हुए भी एकता के सूत्र में बँधे रहना 'चाहिए। ऐसा होगा तो जैसे गौ अचल खड़ी रहकर दूध की सहस्रों धाराएँ दे डालती है, वैसे ही सृथचिवीमाता धम-धान्य को सहसों रूपी में देकर मानव का कल्याण करेगी । विश्व को शान्ति के एक सूत्र में बाँधने के उपाय भी बेद में बताए गए हैं । अथर्ववेद (12 1 13 मैं 'बताया गया है




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