ठण्डी सड़क | Thandi Sadak

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Thandi Sadak by कुटिलेश - Kutilesh

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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४ ठंढी सड़क गिद कहीं “प्र मी एक घणटा भी रो आावे तो तीन दिनकी मूसला- धार वृष्टिकी समा बैँघ जाय ! नाव-डॉगी किसीक घरपर तैयार रहती नहीं है । बाजार भी जाना हो तो किघरसे जाय ?”! खेर यही मान लीजिये । कोई साहब “'इज्लेण्डमें नो मास” पस्तक लिखना चाहते हैं, परन्तु इसक पहले इड्जलैण्डमें नी मास रहना भी आवश्यक है, ओर फिर इसक पहले रास्ता भी तो पार करना पढ़ेगा । लेकिन एक प्रेमी कहता है कि “मैं अगर शाह करू दम में समुन्दर जल जाय ।” यदि ऐसा प्र मी अ्रदावतसे '“समुन्दर” ही सोख ले तो जहाजका रास्ता कहांस रहेगा ? तब पस्तक लिखनेवाले महाशय अपने बालकपन पर ही अाँसू बहा बद्दाकर पस्तकका नाम “'पेटमें नौ मास” रख सकते हैं सजनबन्द ! यद्यपि “रहीम” कवि कह्द गये हैं किः-- रहिमन वे नर मर चुके; प्रम करन कहूँ जांय । उनस पहले वे मुये; घर बंठे जमुद्दांय ॥। परन्तु प्रमीकी तो क्या किसीकी भो म्त्यु समभ लेनेस ही नहीं हो सकती । सृत्युके लिये तो सचमुच मरना ही पढ़ेगा । तब लोक-नीतिग्रन्थ “'आल्हा' में झाता है किः-- बारह बरस तक कुत्ता जीवे श्री, तेरद तक जिये सियार । बरस झठारह प्रेमी जीवै; शागे जीवनका घिरकार ॥ परन्तु भाइयों ! सच बात तो यद्द है कि मैं न तो श्राल्हाको नीति अथवा प्रामाणिक ग्रन्थ ही मानता हूँ और न यहां यही विवेचन करनेके लिये खड़ा हुआ हूँ कि प्र मी कितने दिन जीता है । मुे तो उन लोगोंकी बातका उत्तर देना है, जो कहते हैं कि प्र मीकी सत्यु वियोगकी वेदनास होती है | डाक्टर कवि--'गालिब' साहब कहते थे कि 'ददका हद्से शुजरना है दवा हो जाना ।” वेदनास विदाई कहां ? हमारे जेसे




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