चतुर्विशति-जिनेन्द्र-स्तवननि | Chaturvishati-jinender-stavanani

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Chaturvishati-jinender-stavanani by अज्ञात - Unknown

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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-अपुनेभव नगर प्रजिगमिषो, ' रघुंना- जिन बंधः्वर हे १० रक न फ़रै « सिद्धाथा: झुम कश्चिते! युक्त, मुक्ता फल इनिजन सुंदर है.। गन: अेदेशान्तर समयान्तर, ख स्परशोयन ममलतर हैः।। के. की जय: जय विश्व जनेश्वर है ।। ११८4... :. मिध्यात्वादि कुंपथविधाना, दनिशघुत्तमाग्रेसर हू 1 ८: _ 'बद्धित घन घन .घाति -कमेगण; तिमिर रुजवरणेतर हे :।। जय .जय विश्व जनश्वर है ॥: १९ ॥ . छोकांलोक विलोकने. केचछ़, चिददशन नयनेषर हे. । .. मम करुणोप॑धि परम रसांजन,: विंधिनोद -घाटय,काकर, हे ॥ . 'जयः:जय. विश्व जनेग्वर हैं 0, डे. ॥. सप्तामि/सस्वन्घा, विद बदन, दिवंचन्द्रानेदित,. भक्त चकोर विपत्सर, हे. | : “प्रश्नमिते .दुरिभ-ताप विजितासत,..मघुरिम ज्परस सांगर दे रह जय. जय. विश्व :जनेश्वर हे ॥॥.' २४:.॥ कि दूर वर » ( कलदा:. 7) की कल संक्रठें: ठोकालोक लोकन चिपल ' केचल:लोचन 7... आनन्दघन . पद कंदजलदोयपहित चनविरो चनः '. <संवरज इत्थ मु्दों -वाचक पुण्यशील .गणि स्तुतेर, .... संभवत भूरि विभ्ूतये भवतामनन्त मंहोयुतः 1१५ ५--आ्रा सुमात 1जनन्द्र स्तवः | _(:मीत पद्धति सारंगरागस्वराजुसारि-सुखि चतुर सुजाण पर- नारी खु प्रीत दीकंबहु न कीजिये. अंनया गरबा- ....




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