महाकवि दौलतराम कासलीवाल व्यक्तित्व एवं कृतित्व | Mahakavi Dolataram Kasaliwal Vyaktitv Aur Krititv

[adinserter block="2"]
Add Infomation AboutKastoorchand Kasliwal
लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
7 MB
कुल पष्ठ :
436
श्रेणी :
हमें इस पुस्तक की श्रेणी ज्ञात नहीं है |आप कमेन्ट में श्रेणी सुझा सकते हैं |
यदि इस पुस्तक की जानकारी में कोई त्रुटि है या फिर आपको इस पुस्तक से सम्बंधित कोई भी सुझाव अथवा शिकायत है तो उसे यहाँ दर्ज कर सकते हैं
लेखक के बारे में अधिक जानकारी :
No Information available about कस्तूरचंद कासलीबल - Kastoorchand Kasliwal
पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)भारश८वीं शत्ताव्दी के महाकचि दौलतरामजी कासलीवाल के जीवन एवं
साहित्य पर भ्राचारितत पुस्तक पाठकों के समक्ष श्रस्तुत है । महाकवि मे हिन्दी
साहित्य की जो महान् सेवा की थी उसी पर इसमें: प्रकाश डाला गया है ।
“दौलतराम कासलीवाल व्यक्तित्व एवं कृतित्व” पुस्तक प्रकाशन के लिये मैं
श्री दि० जैन झ० क्षेत्र श्रीमहावीरजी की प्रवस्वका रिणी कमेटी के सभी सदस्यों
एवं विशेषत्त: उसके श्रव्यक्ष श्री सोहनलाल जी सा० काला एवं मंत्री श्री
सोहनलाल जी सा० सोगाणी का झाभारी हूँ । जैन साहित्य के संरक्षण एवं
प्रकाशन की श्र झाप दोनों की ही काफी रुचि है जो सर्वेथा स्वागत
योग्य है ।पुस्तक के प्रस्तुतीकरण में प॑ं० श्रन्नपचन्द जी न्यायतीर्थ का जो पूर्ण
सहयोग मिला है इसके लिये मैं उनका पूर्ण श्राभारी हूँ । कवि के जीवस्थर
चरित को खोज निकालने का श्रेय भी आपको है । मैं मेरे अन्य सहयोगी
श्री प्रेमचस्द राँवका एम. ए. रिचसँ स्कालर का भी श्राभारी हूँ जिन्होंने कवि
के ग्रन्थों की प्रेस कापी करने में पूर्ण सहयोग दिया है । जयपुर के दि० जैत
मन्दिर पाटोदी शास्त्र भण्डार के व्यवस्थापक श्री भंवरलाल जी बज का भी
श्राभारी हूँ जिनके शासन भण्डार के गुटके में हमें कलि का जन्मलगन प्राप्त
हुआ है ! इसी तरह पाण्डे लुशकरणुजी के शास्त्र भण्डार के व्यवस्थापक
श्री सिलापचल्द जी वासायत वालों का भी आ्राभारी हूँ जिनके घास भण्डार
की विवेक विलास की एक मात्र पांडुलिपि का पुस्तक में उपयोग किया
सया है 1 इसी तरह उदयपुर के दि० जैन अग्रवाल मंदिर के व्यवस्थापक
ढा० मोहनलाल जी जैन का भी मैं झाभारी हूँ जिनके मंदिर के शास्त्र भण्डार
में संग्रहीत जीवन्वर स्वामि चरित की एक मात्र पाष्डुलिपि का हमने उपयोग
किया है । प्रस्तुत पाण्डुलिपि कवि की मूल पाण्डुलिपि है । श्री वा० राजमलजी
गोवा व्यवस्थापक मंदिर जी ठोलियान् का भी मैं झ्ाभारी हैँ जिनकी अध्यारम
चारहसड़ी की प्रति का इसमें उपयोग किया गया है । मै पं० भंवरलालजी
पोल्पाका जैनदर्शन!चार्य का भी उनके सुकतावों के लिउ आभारी हूँ ।
User Reviews
No Reviews | Add Yours...